अब गांवो में जलकुकडी के दर्शन दुर्लभ हो गए है

अब गांव में जलकुकडी के दर्शन दुर्लभ हो गए है,, एक समय जब नदी बहती थी,पोखर तालाब भरे रहते तो जल कुकड़ी भी उनके किनारे विचरण करते हुए दिख जाती थी…अब नदी तालाब सब मौसमी हो गए,तो जल कुकड़ी भी दुर्लभ हो गई….गाँव के गंदे नाले शायद इसे पसंद नही,क्योंकि प्लास्टिक के जहर से पक्षी भी डरते हैं….जलीय पक्षियों की घटती संख्या ,भूजलस्तर में भारी गिरावट का स्पष्ट प्रमाण है…।
सफेद गर्दन वाली धूसर,सिलेटी रंग की यह जलमुर्गी का अग्र भाग व सर सफेद रंग का होता है…यह गाँव के नदी-तालाबों के पास पायी जाती है…जलमुर्गी की चोंच व पैर पीले रंग के होते हैं…नर व मादा में अधिक अंतर् नहीं होता है केवल मादा थोड़ी छोटी होती है..।
जलमुर्गी सर्वहारी है जो कीड़े मकोड़ों , केंचुओं, मेंढकों आदि के अतिरिक्त कोंपलों व कंद मूल खाती है….जलमुर्गी की लम्बाई 35 सेंटीमीटर तक होती है…।।
जलमुर्गी की लगभग चार प्रजातियाँ पाई जाती हैं… उपरोक्त जानकारी सफेद छाती वाली जलमुर्गी की हैं….।

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