- सीएम मशीन ने छीने सैकड़ों हाथों से काम? अंडरग्राउंड खदानों में बढ़ती मशीनीकरण नीति पर उठे सवाल
रिपोर्ट विशेष – अब्दुल सलाम क़ादरी
भारत में कोयला उत्पादन बढ़ाने के नाम पर अंडरग्राउंड खदानों में तेजी से Continuous Miner (CM) मशीनों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के लिए निजी कंपनियों के माध्यम से सीएम मशीन संचालित करा रही हैं। लेकिन इस मशीनीकरण की कीमत स्थानीय युवाओं और ठेका श्रमिकों को चुकानी पड़ रही है। मजदूर संगठनों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि जहां पहले सैकड़ों श्रमिकों को रोजगार मिलता था, वहां अब कुछ मशीन ऑपरेटरों और तकनीकी कर्मचारियों के भरोसे पूरा उत्पादन कराया जा रहा है।
उत्पादन बढ़ा, रोजगार घटा
कोयला उद्योग में मशीनीकरण के कारण उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में कोल इंडिया का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन कंपनी के कुल कर्मचारियों की संख्या लगातार कम हुई है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक मशीनों और ऑटोमेशन के कारण प्रति टन कोयला उत्पादन में मानव श्रम की आवश्यकता घट रही है।
स्थानीय श्रमिक नेताओं का कहना है कि अंडरग्राउंड खदानों में सीएम मशीन के आने से बेलदार, लोडर, ट्रैकमैन, हेल्पर और अन्य पारंपरिक कार्यों में लगे श्रमिकों की जरूरत कम हो गई है। इससे वर्षों से खदानों से जुड़े परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
स्थानीय युवाओं की जगह बाहरी कर्मियों को मौका?
सबसे बड़ा सवाल रोजगार को लेकर है। खदान प्रभावित क्षेत्रों के युवाओं का आरोप है कि सीएम मशीन संचालित करने वाली निजी कंपनियां स्थानीय बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण और नौकरी देने के बजाय दूसरे राज्यों से तकनीकी कर्मचारी बुला रही हैं। इससे खदानों के आसपास रहने वाले युवाओं में भारी असंतोष है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि खदानों के कारण उनकी जमीनें और पर्यावरण प्रभावित हुए, लेकिन रोजगार के अवसर भी उनसे दूर होते जा रहे हैं।
सुरक्षा और उत्पादन के नाम पर मशीनीकरण
कोल कंपनियों का तर्क है कि सीएम तकनीक से उत्पादन बढ़ता है, ब्लास्टिंग की आवश्यकता कम होती है और कई मामलों में सुरक्षा में सुधार होता है। Continuous Miner तकनीक को भारतीय भूमिगत खदानों में 2010 के बाद बड़े पैमाने पर अपनाया गया और इसे उत्पादन बढ़ाने के लिए उपयुक्त माना गया।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मशीनीकरण के बावजूद दुर्घटनाओं का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और नई तकनीक के साथ नए प्रकार के जोखिम भी सामने आए हैं।
श्रमिक यूनियनों की चुप्पी पर सवाल?
मजदूरों के बीच यह चर्चा तेज है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में अंडरग्राउंड खदानों में पारंपरिक श्रमिकों की संख्या और घट जाएगी। सवाल यह भी उठ रहा है कि श्रमिक यूनियनें स्थानीय रोजगार, कौशल विकास और विस्थापित परिवारों के हितों की रक्षा के लिए कितनी सक्रिय हैं।
स्थानीय मांगें क्या हैं?
खदान प्रभावित क्षेत्रों में श्रमिक और युवा संगठन निम्न मांगें उठा रहे हैं—
- सीएम मशीन संचालित करने वाली कंपनियों में 75% स्थानीय रोजगार सुनिश्चित किया जाए।
- स्थानीय युवाओं को मशीन संचालन और तकनीकी कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाए।
- ठेका श्रमिकों के पुनर्वास और वैकल्पिक रोजगार की नीति बनाई जाए।
- नई परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने का कानूनी प्रावधान लागू किया जाए।
- कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियां रोजगार सृजन पर श्वेत पत्र जारी करें।
कोयला उत्पादन बढ़ाना देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी है, लेकिन विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं बल्कि रोजगार और सामाजिक न्याय भी है। यदि मशीनें उत्पादन बढ़ाएं और स्थानीय युवाओं के हाथ खाली रह जाएं, तो खदान प्रभावित क्षेत्रों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। अब समय आ गया है कि कोल इंडिया, निजी ठेकेदार और श्रमिक यूनियनें मिलकर यह तय करें कि मशीनीकरण और रोजगार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि विकास का लाभ स्थानीय समाज तक भी पहुंचे।
अंक 2 कमींग सून






















