अब्दुल सलाम क़ादरी। महासमुंद।
छत्तीसगढ़ के महासमुंद वन मंडल अंतर्गत वन परीक्षेत्र महासमुंद में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) की खुलेआम अवहेलना का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि यहां पदस्थ रेंजर एवं डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) द्वारा जानबूझकर जनहित से जुड़ी सूचनाएं देने से इनकार किया जा रहा है, जबकि मामला सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग और कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है।
सूचना मांगने पर रेंजर द्वारा यह कहकर इनकार कर दिया गया कि मांगी गई जानकारी RTI Act की धारा 8(1)(j) के अंतर्गत व्यक्तिगत सूचना है और सार्वजनिक नहीं की जा सकती। जबकि जानकारों का कहना है कि यह तर्क पूरी तरह भ्रामक है, क्योंकि मजदूरों की सूची, मस्टर रोल, भुगतान विवरण जैसी जानकारियां सरकारी व्यय एवं जनहित कार्यों से जुड़ी होती हैं, जिन्हें निजी सूचना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
RTI Act क्या कहता है? — कानून बनाम विभागीय मनमानी
धारा 8(1)(j)
यह धारा उन सूचनाओं को अपवाद में रखती है, जो किसी व्यक्ति की निजी जानकारी हों और जिनका सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से कोई लेना-देना न हो।
लेकिन धारा 8(2) क्या कहती है?
“यदि किसी सूचना के प्रकटीकरण से होने वाला जनहित, संभावित नुकसान से अधिक हो, तो ऐसी सूचना अवश्य प्रदान की जाएगी, चाहे वह धारा 8(1) के अंतर्गत अपवाद में क्यों न आती हो।”
यानि —
यदि मामला भ्रष्टाचार, सरकारी धन की हेराफेरी या जनहित से जुड़ा हो, तो सूचना देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
इसके बावजूद महासमुंद वन परीक्षेत्र में कथित रूप से फर्जी मजदूरों के नाम पर फर्जी हाजिरी भरकर सरकारी धन की निकासी जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ी जानकारी देने से मना किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर RTI कानून की आत्मा और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (सूचना का अधिकार) का उल्लंघन है।
फर्जी मजदूर, फर्जी मस्टर रोल और जनता के टैक्स का खेल?
सूत्रों के अनुसार, वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण एवं अन्य विकास कार्यों के नाम पर शासन से प्राप्त राशि का उपयोग वास्तविक मजदूरों के बजाय फर्जी नामों और फर्जी हाजिरी के माध्यम से दिखाया जा रहा है। जब इस संबंध में RTI के तहत मजदूरों की सूची, मस्टर रोल, भुगतान वाउचर एवं कार्य आदेशों की जानकारी मांगी गई, तो उसे धारा 8(1)(j) का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया गया।
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब खुद एक आईएफएस अधिकारी (DFO) भी एक प्रमोटिव रेंजर के कथन का समर्थन करते नजर आ रहे हैं, जो प्रशासनिक नैतिकता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
रेंजर का पुराना विवादित रिकॉर्ड?
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा में है कि संबंधित रेंजर पहले कोरबा क्षेत्र में भी लाखों रुपये के कथित भ्रष्टाचार के मामलों में विवादों से घिर चुका है। अब महासमुंद में वही रेंजर कथित रूप से SDO, कर्मचारियों और तंत्र के माध्यम से वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दे रहा है, और RTI के जरिए सच्चाई सामने आने से पहले ही सूचना पर ताला जड़ दिया जा रहा है।
RTI Act का स्पष्ट उद्देश्य क्या है?
RTI अधिनियम, 2005 का मूल उद्देश्य है —
✔️ शासन में पारदर्शिता
✔️ प्रशासनिक जवाबदेही
✔️ भ्रष्टाचार पर अंकुश
✔️ नागरिकों को सरकारी कार्यप्रणाली की जानकारी का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट एवं विभिन्न राज्य सूचना आयोग बार-बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि:
सरकारी धन, सार्वजनिक कार्यों और मजदूरी भुगतान से जुड़ी सूचनाएं निजी नहीं बल्कि सार्वजनिक प्रकृति की होती हैं, और इन्हें RTI के तहत उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है।
इसके बावजूद महासमुंद वन मंडल में RTI को मजाक बना देना न केवल कानून का अपमान है बल्कि जनता के अधिकारों पर सीधा हमला भी है।
अब आगे क्या? — सूचना आयोग और न्यायालय का रास्ता
RTI कार्यकर्ताओं एवं जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि विभागीय अधिकारी इसी तरह कानून की अवहेलना करते रहे, तो मामला जल्द ही —
➡️ राज्य सूचना आयोग,
➡️ लोकायुक्त,
➡️ ईओडब्ल्यू,
➡️ एवं आवश्यकता पड़ने पर हाईकोर्ट तक ले जाया जाएगा।
कानून के अनुसार, सूचना न देने या गलत तरीके से रोकने पर संबंधित अधिकारी पर —
🔹 ₹250 प्रतिदिन की दर से जुर्माना (अधिकतम ₹25,000 तक)
🔹 विभागीय कार्रवाई
🔹 सेवा अभिलेख में प्रतिकूल प्रविष्टि
जैसी कठोर कार्यवाही का प्रावधान है।
सवालों के घेरे में वन विभाग
❓ यदि सब कुछ पारदर्शी है तो मजदूरों की सूची और भुगतान विवरण देने में डर क्यों?
❓ RTI कानून की स्पष्ट धाराओं को दरकिनार कर धारा 8(1)(j) का दुरुपयोग क्यों?
❓ क्या शासन से मिले करोड़ों रुपये के वृक्षारोपण और विकास कार्य सिर्फ कागजों में ही हुए हैं?
महासमुंद वन मंडल में सामने आया यह मामला केवल सूचना न देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार, संरक्षण और जवाबदेही के अभाव की भयावह तस्वीर पेश करता है। RTI जैसे सशक्त कानून को जिस तरह कुचला जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
अब देखना यह है कि शासन और निगरानी संस्थाएं इस मामले में चुप्पी साधती हैं या फिर जनता के अधिकार और कानून की गरिमा की रक्षा के लिए ठोस कार्रवाई करती हैं।






















