अब्दुल सलाम क़ादरी
भारत में 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्ता में है। इस दौरान मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर कई तरह के प्रभाव पड़े हैं। इस रिसर्च रिपोर्ट में हम विभिन्न स्रोतों, सरकारी आंकड़ों और स्वतंत्र शोधों के आधार पर विश्लेषण करेंगे कि मोदी सरकार के पिछले एक दशक के कार्यकाल में भारत के मुसलमानों की स्थिति कैसी रही।
1. आर्थिक स्थिति और रोजगार बेरोजगारी और आर्थिक असमानता
भारत में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति पहले से ही चुनौतियों से भरी रही है। लेकिन 2014 के बाद से कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुसलमानों के लिए नौकरियों और आर्थिक अवसरों की स्थिति और कठिन हुई है।
- अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत में मुसलमानों की बेरोजगारी दर अन्य समुदायों की तुलना में अधिक रही है।
- सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी घटकर 4.9% रह गई है, जबकि वे भारत की जनसंख्या का करीब 14% हैं।
- नोटबंदी (2016) और GST (2017) जैसे फैसलों का सबसे अधिक असर छोटे व्यापारियों और कारीगरों पर पड़ा, जिनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की थी।
शिक्षा और सामाजिक विकास
- सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मुसलमानों की साक्षरता दर अभी भी अन्य समुदायों से कम है।
- सच्चर कमेटी की रिपोर्ट (2006) में कहा गया था कि मुसलमानों की शिक्षा और सरकारी सेवाओं में भागीदारी बहुत कम है, और हाल के वर्षों में इसमें कोई खास सुधार नहीं हुआ है।
- नई शिक्षा नीति (NEP-2020) के बाद कई मदरसों की फंडिंग कम कर दी गई, जिससे अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को नुकसान हुआ।
2. राजनीतिक स्थिति और नागरिक अधिकार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC
2019 में लाया गया CAA मुस्लिमों को छोड़कर अन्य शरणार्थी समुदायों को नागरिकता देने की बात करता है, जिससे देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए।
- शाहीन बाग आंदोलन (2019-20) इसका सबसे बड़ा उदाहरण था, जिसमें लाखों लोगों ने भाग लिया।
- उत्तर-पूर्वी राज्यों और असम में NRC लागू करने की बात कही गई, जिससे लाखों मुसलमानों के नागरिकता संकट में पड़ने की आशंका बढ़ी।
हेट क्राइम और मॉब लिंचिंग
2014 के बाद से मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) की घटनाएं बढ़ी हैं, जिनमें गो-रक्षा और “लव जिहाद” जैसे मुद्दों पर मुसलमानों को निशाना बनाया गया।
- FactChecker.in के अनुसार, 2014 के बाद से मुसलमानों के खिलाफ हेट क्राइम की घटनाओं में 40% से अधिक की वृद्धि हुई है।
- कई मामलों में आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिला और पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की कोशिश की गई।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति हिजाब विवाद और धार्मिक पहचान
2022 में कर्नाटक में हिजाब बैन विवाद ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर बहस छेड़ दी।
- कई राज्यों में मस्जिदों के लाउडस्पीकर और हलाल मीट जैसे मुद्दों पर विवाद उठाए गए।
- 2023 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ‘लव जिहाद’ कानून लागू किए गए, जिससे अंतरधार्मिक विवाहों पर कड़ा नियंत्रण लगाया गया।
राजनीतिक भागीदारी की गिरावट
- भाजपा ने पिछले एक दशक में एक भी मुस्लिम सांसद को टिकट नहीं दिया, जिससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर हुआ।
- कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा है, जिससे राजनीतिक मंच पर मुसलमानों की आवाज कमजोर हुई है।
4. सरकार की योजनाएं और मुसलमानों का लाभ
हालांकि, कुछ योजनाओं से मुसलमानों को भी लाभ हुआ है, जैसे:
- प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ सभी गरीबों को मिला, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं।
- लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में सरकारी स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा।
निष्कर्ष
मोदी सरकार के कार्यकाल में मुसलमानों के सामने कई नई चुनौतियां आई हैं। आर्थिक असमानता, रोजगार संकट, शिक्षा में गिरावट, राजनीतिक हाशिए पर जाना और हेट क्राइम जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। हालांकि, कुछ सरकारी योजनाओं से मुसलमानों को लाभ भी मिला है, लेकिन कुल मिलाकर उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।
भारत का संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है, लेकिन हाल के वर्षों में मुसलमानों को नागरिक अधिकारों और सुरक्षा को लेकर नई चिंताओं का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि भारत की विविधता और लोकतंत्र की मजबूती बनी रहे।