अब्दुल सलाम क़ादरी
- आरटीआई में ‘कैम्पा मद कोई मद नहीं’ का जवाब: चिरमिरी वन परीक्षेत्र में जिम्मेदारों की नासमझी या जानबूझकर गुमराह करने की कोशिश?

मनेन्द्रगढ़ वन मण्डल अंतर्गत वन परीक्षेत्र चिरमिरी से सामने आया आरटीआई जवाब अब बड़े सवाल खड़े कर रहा है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी के उत्तर में यह कह दिया गया कि “कैम्पा मद कोई मद नहीं है”—जबकि जमीनी सच्चाई इसके ठीक उलट है। छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश में कैम्पा (CAMPA) मद से वनीकरण, संरक्षण, मुआवजा, अधोसंरचना और रोजगार से जुड़ी कई योजनाएं संचालित होती रही हैं और करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
आरटीआई में ऐसा जवाब देना केवल तकनीकी भूल नहीं माना जा सकता। सवाल यह है कि क्या यह जानकारी छिपाने की कोशिश है, या फिर वन प्रशासन में बैठे जिम्मेदारों की गंभीर अज्ञानता? अगर कैम्पा मद “कोई मद नहीं” है, तो वर्षों से चल रही योजनाएं, स्वीकृत बजट और किए गए भुगतान किस खाते से हुए?
रेंजर पर सीधा सवाल
वन परीक्षेत्र चिरमिरी के स्तर पर दिए गए इस जवाब ने रेंजर की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। आरटीआई का उद्देश्य पारदर्शिता है, लेकिन यहां तो सूचना को सिरे से नकारा जा रहा है। क्या यह उच्चाधिकारियों को गुमराह करने और रिकॉर्ड से बचने का तरीका है?
उच्चाधिकारियों से मांग
- इस आरटीआई जवाब की तत्काल जांच कराई जाए।
- कैम्पा मद से जुड़े स्वीकृति आदेश, व्यय विवरण और कार्य प्रगति सार्वजनिक की जाए।
- भ्रामक/गलत सूचना देने के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हो।
- यह स्पष्ट किया जाए कि कैम्पा मद के करोड़ों रुपये कहां-कहां और कैसे खर्च हुए।
बड़ा सवाल
क्या छत्तीसगढ़ में ऐसे अधिकारियों को रेंजर बनाकर बैठाया गया है जिनका काम केवल फाइलों में खेल और घोटालों पर पर्दा डालना रह गया है? या फिर इस मामले में कड़ी कार्रवाई कर यह संदेश दिया जाएगा कि आरटीआई से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं?
यह मामला सिर्फ एक जवाब का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है। अब देखना होगा कि वन विभाग के उच्चाधिकारी सच्चाई सामने लाते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।





















