अब्दुल सलाम क़ादरी-प्रधान संपादक
डोला/अनूपपुर। डोला नेशनल हाईवे पर चला ट्रक यूनियनों का तथाकथित आंदोलन अब समाप्त हो चुका है, लेकिन उसके पीछे चला संगठित उगाही, सौदेबाजी और कंपनी को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का खेल अब खुलकर सामने आ रहा है। आंदोलन ट्रक मालिकों के हित का नहीं, बल्कि यूनियन माफिया के वसूली नेटवर्क को मजबूत करने का हथियार बन चुका था।
लोडिंग के नाम पर वसूली, यूनियन की मासिक ‘हफ्ता’ प्रणाली
कोलरी क्षेत्रों में..
प्रबंधन और लिफ्टरों द्वारा लोडिंग के नाम पर अवैध वसूली
वहीं यूनियनों द्वारा ट्रकों से मासिक शुल्क (हफ्ता)
खुलेआम वसूला जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा सिस्टम बिना किसी ऑडिट, बिना आय-व्यय के हिसाब और बिना किसी वैधानिक अनुमति के वर्षों से चल रहा है।
कोयला डीओ में यूनियन की सीधी घुसपैठ
सबसे सनसनीखेज खुलासा यह है कि कुछ यूनियनें कोयला डीओ (डिस्पैच ऑर्डर) प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप कर रही हैं।
डीओ किसे मिलेगा, कौन सा ट्रक चलेगा, कौन बैठेगा — इसका फैसला कंपनी नहीं, यूनियन तय कर रही है।
इससे न केवल कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि पूरे कोयला परिवहन तंत्र की साख पर सवाल खड़े हो गए हैं।
आंदोलन = दबाव बनाने का औजार
आंदोलन कोई अंतिम हथियार नहीं, बल्कि दबाव बनाने का ट्रेडिंग टूल बन गया है।
जैसे ही (भाड़ा) बढ़ता है —
👉 आंदोलन शुरू
👉 नारेबाजी
👉 प्रशासनिक अफसरों की मौजूदगी
👉 फिर सौदा
👉 और आंदोलन खत्म
इसके बाद अवैध वसूली पर अचानक चुप्पी छा जाती है।
नेता और अफसर मौजूद, फिर भी जांच से दूरी
सब कुछ प्रशासनिक अधिकारियों और क्षेत्रीय नेताओं की मौजूदगी में होता है। इसके बावजूद हर बार दोनों पक्षों की वसूली पर पल्ला झाड़ लिया जाता है, जो सीधे-सीधे संरक्षण की ओर इशारा करता है।
नाम बताओ, लेकिन सिस्टम मत छुओ
हसदेव क्षेत्र के महाप्रबंधक मनोज कुमार का बयान —
“नाम बताइए, सस्पेंड कर दूंगा।”
यह बयान सवालों से बचने का तरीका लगता है, क्योंकि
जब वसूली संगठित है,
जब यूनियन खुलेआम वसूली कर रही है,
तो केवल नाम बताने की शर्त क्यों?
सिस्टम की जांच से डर क्यों?
जांच नहीं, क्योंकि सच बाहर आ जाएगा?
यदि प्रबंधन की लोडिंग वसूली और यूनियन की मासिक उगाही का स्वतंत्र ऑडिट करा दिया जाए, तो
करोड़ों का खेल सामने आ सकता है
कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। शायद इसी डर से जांच को जानबूझकर टाला जा रहा है।
यह आंदोलन नहीं, आर्थिक अपराध का मॉडल है
डोला का मामला साफ संकेत देता है कि
👉 यूनियन अब मजदूरों की नहीं,
👉 बल्कि उगाही और डीओ कंट्रोल के धंधे की प्रतिनिधि बन चुकी है।
सवाल जो अब दबाए नहीं जा सकते
यूनियन को डीओ सिस्टम में घुसने की अनुमति किसने दी?
मासिक उगाही किस कानून के तहत हो रही है?
प्रबंधन और यूनियन की वसूली का ऑडिट क्यों नहीं?
आंदोलन खत्म होते ही अवैध वसूली का मुद्दा क्यों दफन हो जाता है?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मानना गलत नहीं होगा कि
डोला में आंदोलन नहीं, संगठित ‘कोयला खेल’ चलता है।





















