अब्दुल सलाम क़ादरी। मरवाही | विशेष खोजी रिपोर्ट
मरवाही वन परिक्षेत्र एक बार फिर गंभीर आरोपों के चलते सुर्खियों में है। प्राप्त लिखित शिकायतों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार मरवाही वन परिक्षेत्र अंतर्गत कटरा, उषाढ़ और बेलझिरिया ग्रामों की वन भूमि में साल और सागौन जैसे राष्ट्रीयकृत व कीमती वृक्षों की अवैध कटाई कराए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
शिकायत में वन रक्षक राकेश पंकज और हरिहर डहरिया/उइके के नाम का उल्लेख किया गया है। आरोप है कि इन वन रक्षकों ने अपने पद और क्षेत्रीय प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए तस्करों को खुली छूट दी और रात के अंधेरे में कीमती वृक्षों की कटाई कर जंगल से बाहर भेजने का रास्ता बनाया।

राष्ट्रीयकृत साल की लकड़ी बाहर, करोड़ों के कारोबार का आरोप
सूत्रों के अनुसार कटे हुए वृक्षों को छत्तीसगढ़ से बाहर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश भेजा गया। बताया जा रहा है कि साल की लकड़ी, जिस पर सरकार का एकाधिकार है और जिसकी बिना अनुमति कटाई दंडनीय अपराध है, वही लकड़ी कथित तौर पर विभागीय संरक्षण में बाहर भेजी गई।
यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल अवैध कटाई का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के सुनियोजित अवैध कारोबार का बन सकता है।
शासकीय वाहन से रात्री वसूली का आरोप
इस पूरे प्रकरण को और अधिक गंभीर बनाने वाला पहलू शासकीय वाहन के कथित दुरुपयोग का है। शिकायत में उल्लेख है कि मरवाही वन परिक्षेत्र का सरकारी वाहन रात के समय वसूली के लिए उपयोग किया गया।
बरौर से मरवाही के बीच आने-जाने वाले व्यावसायिक वाहनों को रोककर कथित रूप से अवैध वसूली की जाती थी। आरोप यह भी है कि यह वसूली किसी निजी गिरोह द्वारा नहीं, बल्कि सरकारी वाहन की आड़ में की जाती रही।
यदि यह आरोप सही हैं, तो यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है —
क्या सरकारी संसाधन ही अवैध गतिविधियों का माध्यम बन गए?
ड्राइवर के खाते में ₹1.44 लाख का डिजिटल ट्रांसफर??
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू डिजिटल लेनदेन के सामने आए स्क्रीनशॉट्स हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार ₹80,000, ₹39,000 और ₹25,000 की ऑनलाइन ट्रांजैक्शन कुल ₹1,44,000 की राशि मरवाही वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) मुकेश कुमार साहू के ड्राइवर तेज सिंह रजक के खाते में ट्रांसफर की गई।
सूत्र यह भी दावा करते हैं कि ऑनलाइन राशि के अतिरिक्त लगभग ₹30,000 नगद भी लिए गए। शिकायत में उल्लेख है कि कथित वसूली के दौरान रेंजर की मौजूदगी भी बताई गई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि रेंजर मुकेश कुमार साहू को मरवाही वन परिक्षेत्र अधिकारी बने अभी लगभग दो महीने ही हुए हैं। इतने कम कार्यकाल में ही लाखों रुपये की कथित वसूली और तस्करी संरक्षण के आरोप सामने आना कई सवाल खड़े करता है।
क्या यह पूरा नेटवर्क पहले से सक्रिय था?
या फिर कम समय में ही अवैध तंत्र स्थापित हो गया?
सरकार और मंत्री भी कटघरे में
अब सवाल सीधे सरकार और राजनीतिक नेतृत्व पर उठ रहे हैं। वन विभाग सीधे राज्य सरकार के अधीन है, ऐसे में यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि —
👉 जब जंगल कट रहे थे, तब शासन कहां था?
👉 क्या वन मंत्री को अपने ही विभाग की गतिविधियों की जानकारी नहीं थी?
👉 मुख्यमंत्री कार्यालय तक शिकायतें पहुंचने के बाद भी ठोस हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?
जनता पूछ रही है — क्या जंगल माफिया सरकार से ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं?
डीएफओ ग्रीष्मी चांद — कार्रवाई या केवल खानापूर्ति जांच?
इस पूरे मामले पर वन मंडलाधिकारी (DFO) ग्रीष्मी चांद ने मीडिया से चर्चा में कहा है कि मामले की जांच के लिए एसडीओ को निर्देश दिए गए हैं और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जांच तब क्यों शुरू हुई जब मामला सार्वजनिक हुआ? और अगर अपराध पहले ही प्रमाणित थे, तो उस समय कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
लोगों को आशंका है कि यह जांच कहीं समय खींचने और मामला ठंडा करने की रणनीति न बन जाए।
विभागीय जवाब और बढ़ती जांच की मांग
मामले में अब उच्च स्तरीय जांच की मांग उठ रही है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि —
- संबंधित वन रक्षकों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो
- रेंजर और वाहन उपयोग के रिकॉर्ड की फॉरेंसिक जांच की जाए
- डिजिटल ट्रांजैक्शन की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए
- जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
वन विभाग की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की जा रही है। यदि आरोप निराधार हैं, तो विभाग को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए; और यदि आरोपों में सच्चाई है, तो कठोर कार्रवाई आवश्यक होगी.
मरवाही के जंगल केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि राज्य की धरोहर हैं। यदि वन सुरक्षा से जुड़े अधिकारी ही आरोपों के घेरे में आ जाएं, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि —
✔ क्या मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होगी?
✔ क्या डिजिटल साक्ष्यों की आधिकारिक पुष्टि होगी?
✔ क्या दोषी पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई होगी?
मरवाही का यह मामला केवल एक क्षेत्र की खबर नहीं, बल्कि वन संरक्षण तंत्र की परीक्षा बन चुका है।






















