July 9, 2026 10:57 pm

“रिमोट का लोकतंत्र:मोदी का चेहरा दिखा नहीं कि चैनल बदल गया!”

  • सोशल मीडिया पर वायरल दावे ने छेड़ी बहस — क्या जनता सचमुच खबर देखती है या सिर्फ चेहरा?

अब्दुल सलाम क़ादरी

आजकल राजनीति का सबसे बड़ा चुनाव शायद ईवीएम में नहीं, बल्कि टीवी के रिमोट पर हो रहा है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल है, जिसमें दावा किया गया है कि “70 प्रतिशत लोग प्रधानमंत्री का चेहरा टीवी पर देखते ही चैनल बदल देते हैं।” इस दावे की सत्यता स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं है, लेकिन इसने मीडिया, राजनीति और दर्शकों की पसंद पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

कहते हैं लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है, लेकिन अब लगता है कि असली जनार्दन तो टीवी का रिमोट बन चुका है। नेता चाहे सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, दर्शक का अंगूठा अब पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर हो गया है।

वायरल पोस्ट में किए गए दावे के मुताबिक बड़ी संख्या में लोग एक ही चेहरे को बार-बार देखकर चैनल बदल देते हैं। दावा कितना सही है, यह अलग विषय है, लेकिन यह जरूर सच है कि दर्शक अब केवल भाषण नहीं, बल्कि नई जानकारी, निष्पक्ष बहस और जमीनी मुद्दे देखना चाहते हैं।

व्यंग्य यही है कि कभी चैनल टीआरपी के पीछे भागते थे, अब शायद टीआरपी दर्शकों के पीछे भाग रही है। अगर हर खबर का अंत एक ही चेहरे और एक ही बयान से होगा, तो दर्शक भी सोचेंगे—”भाई, कुछ नया है क्या?”

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में किसी एक नेता का लगातार मीडिया पर दिखाई देना समर्थकों को उत्साहित कर सकता है, लेकिन कुछ दर्शकों में “स्क्रीन थकान” (Screen Fatigue) भी पैदा कर सकता है। यही कारण है कि लोग कभी समाचार से नहीं, बल्कि प्रस्तुति के दोहराव से ऊब जाते हैं।

लोकतंत्र में वोट पाँच साल में एक बार पड़ता है, लेकिन टीवी का “चैनल बदलने वाला वोट” हर पाँच मिनट में पड़ जाता है। जनता की उंगली ईवीएम पर बाद में चलती है, रिमोट पर पहले चल जाती है।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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