November 6, 2026 2:38 pm

वैध दस्तावेज होने के बावजूद 9 महीने तक जब्त रही छत्तीसगढ़ की बस, हाईकोर्ट ने RTO प्रयागराज को लगाई कड़ी फटकार

  • 33 मिनट के अंतराल में दो अलग-अलग स्थानों पर काटे गए चालान निरस्त, बस को चलने योग्य बनाकर लौटाने का आदेश; 30 नवंबर को परिवहन आयुक्त और RTO को देना होगा जवाब

प्रयागराज। वैध परमिट, फिटनेस, बीमा, टैक्स और प्रदूषण प्रमाणपत्र होने के बावजूद छत्तीसगढ़ की एक टूरिस्ट बस को करीब नौ महीने तक जब्त रखे जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। स्टार टूर एंड ट्रेवल्स की इस बस के खिलाफ जारी दोनों चालानों को न्यायालय ने निरस्त कर दिया है। साथ ही उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त और RTO प्रयागराज को बस को चलने योग्य स्थिति में बहाल कर मालिक को वापस सौंपने का निर्देश दिया है।

न्यायालय ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में बस को जब्त करने वाले कर्मचारियों की पहचान, उनके विरुद्ध की गई विभागीय कार्रवाई और न्यायालय के आदेश के पालन में हुए खर्च का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करना होगा।

33 मिनट में दो चालान, जब्ती की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

मामला रिट-ए संख्या 3658/2026, छत्तीसगढ़ की स्टार टूर एंड ट्रेवल्स की बस से संबंधित है। याचिका पर न्यायालय संख्या 21 में न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 21 फरवरी 2026 को सुबह 6:21 बजे नवाब युसूफ रोड पर बस का पहला चालान अतिरिक्त सीट होने के आरोप में काटा गया। इसके महज 33 मिनट बाद सुबह 6:54 बजे महात्मा गांधी मार्ग, जॉर्ज टाउन में दूसरा चालान परमिट की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में काट दिया गया।

याचिका में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया कि जब पहले चालान के समय ही बस को जब्त कर लिया गया था, तो 33 मिनट बाद दूसरी जगह पर बस का दूसरा चालान कैसे काटा गया?

बस में छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश के खागा-फतेहपुर जा रहे पर्यटक सवार थे। बस के परमिट में 40 सीटें (11 स्लीपर और 29 सिटिंग) दर्ज थीं। याचिकाकर्ता का दावा था कि चालान की तारीख पर बस के सभी आवश्यक दस्तावेज वैध थे। इसके बावजूद बस को जब्त कर लिया गया और जब्ती का सीजर मेमो भी उपलब्ध नहीं कराया गया।

नौ महीने तक सरकारी परिसर में खड़ी रही बस, सामान गायब होने का मामला सामने आया

21 फरवरी 2026 से बस रोडवेज बस स्टैंड, सिविल लाइंस प्रयागराज परिसर में खड़ी रही। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस दौरान बस की हालत लगातार खराब होती गई। टायर, बैटरी, सीटों और अन्य सामान के गायब होने की शिकायत सामने आई।

बस को वापस पाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए गए, लेकिन राहत नहीं मिली। आखिरकार बस मालिक को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

हाईकोर्ट ने अधिकारियों से मांगा जवाब, व्यक्तिगत उपस्थिति के दिए निर्देश

28 सितंबर 2026 को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को अंधेरे में रखा गया है। न्यायालय ने RTO प्रयागराज अथवा ARTO प्रवर्तन के सक्षम अधिकारी को संबंधित फाइल के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया।

7 अक्टूबर को दोनों अधिकारी न्यायालय में उपस्थित हुए। अदालत ने उनसे सवाल किया कि जब पहले चालान के बाद बस जब्त कर ली गई थी, तो कुछ ही मिनट बाद दूसरे स्थान पर दूसरा चालान किस आधार पर किया गया? अधिकारियों ने जवाब देने के लिए समय मांगा।

इसके बाद न्यायालय ने 8 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे बस का निरीक्षण कराकर उसकी स्थिति की रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।

निरीक्षण में खुली लापरवाही की पोल, बस से सामान गायब मिलने की पुष्टि

न्यायालय के निर्देश पर किए गए निरीक्षण में बस के दरवाजों के ताले, बैटरी और कुछ स्लीपर गद्दे गायब पाए गए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी बताया कि 28 सितंबर को बस के टायर भी गायब थे और बाद में दूसरे टायर लगाए गए।

न्यायालय ने निरीक्षण के तथ्यों पर विचार करते हुए माना कि सरकारी अभिरक्षा में रखी गई बस में चोरी होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

4 नवंबर को हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

4 नवंबर 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान राज्य पक्ष ने बस की जब्ती के समर्थन में मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 207 का हवाला दिया।

हालांकि, न्यायालय ने पाया कि बस को जब्त करने के बाद संबंधित अधिकारियों ने उसे साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखने की उचित व्यवस्था नहीं की। अतिरिक्त सीटों के आरोप को भी इस स्थिति में प्रमाणित नहीं किया जा सकता, क्योंकि बस को जब्त करने के बाद उसकी स्थिति सुरक्षित नहीं रखी गई।

न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली को मनमाना बताते हुए कहा कि धारा 207 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। बस सरकारी अभिरक्षा में रहने के दौरान खराब हुई और उसमें से सामान गायब होने की बात भी निरीक्षण में सामने आई।

दोनों चालान निरस्त, बस को चलने योग्य बनाकर लौटाने का आदेश

हाईकोर्ट ने दोनों चालानों को निरस्त करते हुए उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त और RTO प्रयागराज को निर्देश दिया कि बस को चलने योग्य स्थिति में बहाल किया जाए और उसके बाद फिटनेस प्रमाणपत्र के लिए संबंधित पंजीकरण प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद बस मालिक परमिट के नवीनीकरण के लिए आवेदन कर सकेगा। न्यायालय ने पूरी प्रक्रिया तीन सप्ताह के भीतर, यानी 25 नवंबर 2026 तक पूरी करने का निर्देश दिया।

30 नवंबर को फिर होगी सुनवाई, अधिकारियों को देना होगा हिसाब

न्यायालय ने मामले को 30 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इस दिन परिवहन आयुक्त और RTO प्रयागराज को न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित जानकारियां प्रस्तुत करनी होंगी—

  1. बस को जब्त करने वाले कर्मचारियों की पहचान और उनका पूरा विवरण।
  2. संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध विभाग ने क्या कार्रवाई की?
  3. न्यायालय के आदेश का पालन करने में कितना खर्च आया?
  4. इस खर्च की व्यवस्था किस प्रकार की गई?

अदालत ने अधिकारियों से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि बस को जब्त करने की कार्रवाई किसने और किस आधार पर की थी।

नौ महीने की लड़ाई के बाद बस मालिक को मिली बड़ी राहत

करीब नौ महीने तक बस सरकारी परिसर में खड़ी रहने और उसके सामान के गायब होने के आरोपों के बीच हाईकोर्ट का यह आदेश बस मालिक के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अब निगाहें 25 नवंबर तक बस को चलने योग्य बनाकर लौटाने के आदेश के पालन और 30 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

यह मामला केवल एक बस की जब्ती का नहीं, बल्कि सरकारी अभिरक्षा में रखे वाहनों की सुरक्षा, परिवहन विभाग की जवाबदेही और कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया के पालन से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े करता है।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

विज्ञापन
error: Content is protected !!