July 15, 2026 2:56 pm

‘चोर-चोर मौसेरे भाई?’ वन अपराधों की जानकारी रोकने पर उठे सवाल

  • वन अपराधों की जानकारी देने से इनकार, क्या वन विभाग बचा रहा है बड़े राज?
  • RTI में मांगी गई 2021 से 2026 तक की वन अपराधों की सूची नहीं दी, प्रथम अपील भी खारिज, अब सूचना आयोग जाएगा मामला

मरवाही/बिलासपुर। वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत मरवाही वनमंडल में वर्ष 2021 से 2026 तक दर्ज वन अपराधों की सूची, उन पर की गई कार्रवाई तथा वर्तमान स्थिति की जानकारी मांगे जाने के बावजूद विभाग ने सूचना देने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं मुख्य वन संरक्षक, बिलासपुर वृत्त ने भी जनसूचना अधिकारी के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील निरस्त कर दी।

पत्रकार अब्दुल सलाम कादरी द्वारा दायर आरटीआई आवेदन में वर्ष 2021 से 2026 तक मरवाही वनमंडल में दर्ज सभी वन अपराध प्रकरणों की सूची, संबंधित कार्रवाई तथा प्रकरणों की वर्तमान स्थिति की जानकारी मांगी गई थी। यह जानकारी सार्वजनिक हित में मांगी गई थी ताकि यह पता चल सके कि वन अपराधों पर विभाग ने क्या कार्रवाई की और कितने मामलों में दोषियों के विरुद्ध प्रभावी कदम उठाए गए।

“जानकारी उपलब्ध नहीं” कहकर किया गया इनकार

जनसूचना अधिकारी ने अपने जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी विभाग के पास वांछित स्वरूप में संधारित नहीं है तथा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत नई जानकारी तैयार करके देना विभाग का दायित्व नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि मांगी गई जानकारी तीसरे पक्ष से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी है, इसलिए इसे धारा 8(1)(j) एवं धारा 11 के तहत उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

प्रथम अपीलीय अधिकारी ने भी 03 जुलाई 2026 को पारित आदेश में जनसूचना अधिकारी के इसी तर्क को स्वीकार करते हुए अपील निरस्त कर दी।

उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल

इस आदेश के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि वर्ष 2021 से 2026 तक वन अपराध दर्ज हुए हैं तो उनकी सूची, अपराध क्रमांक, अपराध का प्रकार और की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड विभाग के पास होना स्वाभाविक है। ऐसे में यह कहना कि जानकारी वांछित स्वरूप में उपलब्ध नहीं है, पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

सूचना के अधिकार से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि किसी रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति की निजी जानकारी दर्ज है, तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत उस निजी हिस्से को छुपाकर (Redact कर) शेष जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है। केवल इस आधार पर पूरी जानकारी रोक देना उचित नहीं माना जाता।

क्या वन अपराधों पर डाला जा रहा है पर्दा?

वन अपराधों की सूची सार्वजनिक नहीं किए जाने से यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं विभाग अवैध कटाई, लकड़ी तस्करी, वन भूमि अतिक्रमण, वन्यजीव अपराध या अन्य गंभीर मामलों की जानकारी सार्वजनिक होने से बचाने का प्रयास तो नहीं कर रहा। हालांकि विभाग ने अपने आदेश में ऐसा कोई स्वीकार नहीं किया है, लेकिन सूचना नहीं देने के कारण पारदर्शिता पर सवाल अवश्य उठ रहे हैं।

द्वितीय अपील की तैयारी

आवेदक अब इस मामले को छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के माध्यम से चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि वन अपराधों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है और इसे छिपाना जनहित के विपरीत है। सूचना आयोग से अपेक्षा की जा रही है कि वह विभाग को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश देगा, ताकि वन अपराधों की वास्तविक स्थिति जनता के सामने आ सके।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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