अब्दुल सलाम कादरी।छत्तीसगढ़ | विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में तबादलों को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता नजर आ रहा है। अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों में महज महीनेभर के भीतर दोबारा फेरबदल किए जाने से विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। अचानक हुए इस बदलाव ने न केवल विभागीय व्यवस्था को असमंजस में डाल दिया है, बल्कि तबादलों के पीछे की मंशा को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
महीनेभर में दोबारा तबादला, आखिर क्यों?
वन विभाग में तबादलों को प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है, लेकिन जब किसी अधिकारी या कर्मचारी का एक महीने के भीतर ही दोबारा तबादला कर दिया जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं। आखिर ऐसी क्या परिस्थिति बनी कि पहले जारी किए गए तबादला आदेश में इतनी जल्दी बदलाव करना पड़ा?
क्या यह प्रशासनिक आवश्यकता थी या फिर तबादलों की प्रक्रिया में किसी तरह का दबाव अथवा अन्य प्रभाव काम कर रहा था? इन सवालों का जवाब विभागीय अधिकारियों को देना चाहिए।
मंत्री और PCCF की भूमिका पर सवाल
ताबड़तोड़ तबादलों के बाद वन विभाग के मंत्री और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। विभाग में लगातार हो रहे फेरबदल से कर्मचारियों के बीच असमंजस की स्थिति बन रही है। ऐसे में प्रशासनिक स्थिरता और कार्यक्षमता पर भी असर पड़ने की आशंका है।
तबादलों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्ट कारणों का अभाव होने पर संदेह की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है। हालांकि, तबादलों में भ्रष्टाचार या अनियमितता के आरोपों की पुष्टि संबंधित आदेशों और दस्तावेजों की जांच के बाद ही की जा सकती है।
क्या तबादलों के पीछे कोई बड़ा खेल?
वन विभाग में लगातार हो रहे फेरबदल को लेकर भ्रष्टाचार और प्रभाव के इस्तेमाल की चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह है कि क्या तबादलों के आदेश निर्धारित प्रशासनिक नियमों और जरूरतों के आधार पर जारी किए जा रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई अन्य वजह है?
यदि तबादलों में अनियमितता हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन परिस्थितियों में अधिकारियों और कर्मचारियों का दोबारा तबादला किया गया और इसके लिए क्या प्रशासनिक आधार था।
अब निगाहें विभागीय नेतृत्व पर हैं। क्या वन विभाग इन सवालों का जवाब देगा या फिर तबादलों का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा? फिलहाल, महीनेभर में दोबारा हुए फेरबदल ने विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।






















