अब्दुल सलाम कादरी-विशेष रिपोर्ट
- ₹17 करोड़? के कथित घोटाले की जांच जायज या राजनीतिक हथियार? भाजपा के भीतर उठे सवाल, कांग्रेस अध्यक्ष ने भी मांगा विशेष ऑडिट
खोंगापानी/एमसीबी।
नगर पंचायत खोंगापानी में कथित वित्तीय अनियमितताओं और करीब ₹17 करोड़ के कार्यों/भुगतानों की जांच की मांग अब केवल नगर पंचायत के कामकाज का मामला नहीं रह गई है, बल्कि इसने राजनीतिक रंग ले लिया है। एक तरफ भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा नगर पंचायत के कार्यों की जांच की मांग को लेकर आंदोलन और क्रमिक भूख हड़ताल की जा रही है, वहीं दूसरी ओर नगर पंचायत की कांग्रेस अध्यक्ष ललिता रामा यादव ने भी पूर्व तथा वर्तमान कार्यकाल के भुगतान, खरीदी और वित्तीय अभिलेखों की विशेष ऑडिट कराने की मांग की है।
सवाल यह नहीं कि जांच कौन मांग रहा है, सवाल यह है कि जांच होगी कब?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नगर पंचायत के वित्तीय लेन-देन को लेकर आरोप और शिकायतें सामने आ रही हैं, तो उनकी निष्पक्ष दस्तावेजी जांच कराने में आखिर बाधा क्या है?
भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा जांच की मांग किया जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कथित अनियमितताएं हुई ही हैं। उसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा विशेष ऑडिट की मांग भी किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती। दोष या निर्दोष होने का निर्धारण केवल सक्षम जांच, रिकॉर्ड और ऑडिट के आधार पर ही हो सकता है।
भाजपा के अंदर भी उठ रहे सवाल
इस मामले की राजनीतिक दिलचस्पी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि जांच की मांग करने वालों में भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं के नाम सामने आ रहे हैं, जबकि नगर पंचायत की वर्तमान अध्यक्ष कांग्रेस से हैं।
यदि भाजपा कार्यकर्ता पूर्व भाजपा कार्यकाल के कार्यों और वित्तीय लेन-देन की भी जांच की मांग कर रहे हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह नगर पंचायत के पुराने कार्यकालों की जवाबदेही तय करने की मांग है या वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व को राजनीतिक रूप से घेरने की रणनीति?
इसका जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
क्या भाजपा दो खेमों में बंटी?
मामले ने भाजपा के भीतर भी मतभेदों की चर्चा को जन्म दिया है। हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरी भाजपा संगठनात्मक रूप से दो हिस्सों में बंट चुकी है।
लेकिन यदि एक ही राजनीतिक दल से जुड़े कार्यकर्ता नगर पंचायत के पूर्व कार्यकालों की जांच की मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं, तो यह निश्चित रूप से स्थानीय राजनीतिक मतभेदों और जवाबदेही को लेकर असहमति का संकेत माना जा सकता है।
इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल अपने ही पूर्व कार्यकाल के कामों की जांच की मांग को भी उतनी ही गंभीरता से आगे बढ़ाएंगे, जितनी गंभीरता से वर्तमान जनप्रतिनिधियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं?
कांग्रेस अध्यक्ष की विशेष ऑडिट की मांग ने बदला पूरा समीकरण
नगर पंचायत अध्यक्ष ललिता रामा यादव ने प्रधान महालेखाकार को पत्र भेजकर पूर्व नगर पंचायत कार्यकाल और अपने वर्तमान कार्यकाल में हुए भुगतान, खरीदी तथा वित्तीय गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड की विशेष ऑडिट कराने की मांग की है। अध्यक्ष का कहना है कि आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच से वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए।
यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि वास्तव में नगर पंचायत के वित्तीय कामकाज में कोई गड़बड़ी हुई है, तो उसका पता राजनीतिक बयानबाजी से नहीं बल्कि बिल, वाउचर, निविदा प्रक्रिया, कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान रिकॉर्ड और कार्यस्थल के भौतिक सत्यापन से चलेगा।
भाजपा शासन में भाजपाइयों की शिकायत—फिर जांच का इंतजार क्यों?
यह मामला अब एक और बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार होने के बावजूद यदि भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं को नगर पंचायत के कथित वित्तीय मामलों की जांच की मांग को लेकर आंदोलन और क्रमिक भूख हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक स्तर पर शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन यहां भी निष्कर्ष निकालने से पहले यह जानना जरूरी है कि संबंधित शिकायतें किस अधिकारी को दी गईं, कब दी गईं, किन दस्तावेजों के साथ दी गईं, उस पर क्या कार्रवाई हुई और क्या कोई जांच आदेश पहले से जारी है।
जिले की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार नागरिक अपनी शिकायत कलेक्टर कार्यालय अथवा ऑनलाइन जनशिकायत पोर्टल के माध्यम से दर्ज करा सकते हैं।
आम नागरिक के लिए सबसे बड़ा सवाल
अगर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता किसी नगर पंचायत के वित्तीय मामलों की जांच के लिए आंदोलन करने को मजबूर महसूस कर रहे हैं, तो आम नागरिक के सामने इससे भी बड़ा सवाल खड़ा होता है—
जब राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोग अपनी शिकायतों के लिए सड़क पर उतरते हैं, तब आम नागरिक की शिकायत कितनी जल्दी सुनी जाती होगी?
जांच हो—लेकिन पूर्व और वर्तमान दोनों कार्यकाल की?
पूरे विवाद का सबसे पारदर्शी समाधान यही दिखाई देता है कि जांच को किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक अध्यक्ष के कार्यकाल तक सीमित न रखा जाए।
पूर्व नगर पंचायत कार्यकाल और वर्तमान कार्यकाल—दोनों के भुगतान, खरीदी, निर्माण कार्य, निविदा, कार्यादेश और वित्तीय अभिलेखों का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए।
यदि आरोप गलत हैं तो जांच के बाद स्थिति साफ हो जाएगी।
यदि अनियमितता नहीं है तो संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को भी राहत मिलेगी।
और यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी तय करने का रास्ता खुलेगा।
अब आंदोलन नहीं, दस्तावेज बोलने चाहिए
खोंगापानी नगर पंचायत का विवाद अब उस मोड़ पर पहुंच चुका है जहां राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक जवाबदेही है।
क्रमिक भूख हड़ताल हो या विशेष ऑडिट की मांग—दोनों के पीछे उठाए जा रहे सवालों का अंतिम उत्तर नगर पंचायत की फाइलों और वित्तीय रिकॉर्ड में ही मिलेगा।
₹17 करोड़ के कथित घोटाले का सच क्या है—यह किसी राजनीतिक दल के बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और ऑडिट रिपोर्ट से तय होना चाहिए।
खबर 30 दिन और बीबीसी लाईव— विशेष खोजी रिपोर्ट
इसी कड़ी में कांग्रेस और भाजपा की प्रतिक्रिया आनी बाकी है प्रतिक्रिया आने पर उनके बयानों को भी अगले अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इससे सम्बंधित किसी के पास कोई खबर है तो हमे वाट्सएप्प 9424257566 पर सूचित करें..






















