नईदिल्ली
दिल्ली के ऐतिहासिक जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club) को खाली कराने के केंद्र सरकार के फैसले पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. क्लब के स्थायी सदस्य और कर्मचारी अब इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. सरकार ने क्लब को 5 जून तक 27.3 एकड़ जमीन और पूरी संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया है।
सरकार का कहना है कि सफदरजंग रोड स्थित यह जमीन ‘अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र’ में आती है और इसका इस्तेमाल रक्षा ढांचे और सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किया जाएगा. हालांकि क्लब के कई सदस्यों ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया है।
अभिषेक मनु सिंघवी लड़ेंगे केस
जानकारी के मुताबिक क्लब की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को कानूनी लड़ाई के लिए नियुक्त किया गया है. बताया जा रहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की जाएंगी. एक याचिका क्लब के सदस्यों की ओर से और दूसरी करीब 600 कर्मचारियों की ओर से दायर होगी।
113 साल पुराने इस क्लब के स्थायी सदस्यों ने रविवार को लंबी बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की. यह बैठक उस आदेश के एक दिन बाद हुई, जिसमें भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने क्लब से उसकी इमारत, लॉन और अन्य सुविधाएं खाली करने को कहा था. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि सरकार की तरफ से नियुक्त क्लब की जनरल कमेटी ने L&DO को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट होने तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग की है।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सरकार लीज की शर्तों के तहत ‘सार्वजनिक हित’ में जमीन वापस लेने के लिए पूरी तरह अधिकृत है. दिल्ली जिमखाना क्लब उन दुर्लभ मामलों में शामिल है, जहां सरकार ने स्थायी लीज को समय से पहले खत्म कर ‘री-एंट्री’ की प्रक्रिया शुरू की है।
‘सैकड़ों कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर खतरा’
रिपोर्ट के मुताबिक, क्लब के सदस्य और कर्मचारी इसे अचानक लिया गया फैसला बता रहे हैं. उनका कहना है कि इससे न केवल क्लब की विरासत खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि सैकड़ों कर्मचारियों की आजीविका भी प्रभावित होगी. क्लब से जुड़े रिटायर्ड जनरल पीके सहगल ने कहा कि सदस्यों ने सर्वसम्मति से सरकार के आदेश को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि बिना किसी पूर्व चेतावनी के लिया गया यह फैसला 600 कर्मचारियों की नौकरियों पर संकट खड़ा कर देगा।
कर्मचारियों में भी इस फैसले को लेकर गहरी नाराजगी है. जिमखाना एम्प्लॉयी वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार के आदेश का विरोध करते हुए कहा कि कई कर्मचारी पिछले 25-26 साल से यहां काम कर रहे हैं और अब उनकी रोजी-रोटी छिनने का खतरा पैदा हो गया है. एसोसिएशन के अध्यक्ष नंदन सिंह नेगी ने कहा कि कर्मचारी और उनके परिवार बेहद परेशान हैं. एक कर्मचारी ने कहा, ‘हमारी झुग्गियां पहले ही टूट रही हैं और अब नौकरी भी चली जाएगी. आखिर हम कहां जाएंगे?’
1930 से मौद है जिमखाना क्लब
कुछ सदस्यों ने सरकार के सुरक्षा संबंधी तर्क पर भी सवाल उठाए हैं. क्लब के एक पूर्व महासचिव ने कहा कि क्लब 1930 के दशक से यहां मौजूद है, जबकि प्रधानमंत्री आवास 1984 में इस इलाके में शिफ्ट हुआ था. अगर सुरक्षा का इतना बड़ा मुद्दा होता तो इतने वर्षों तक कोई समस्या क्यों नहीं हुई?
टीओआई के मुताबिक, क्लब के सदस्य नितिन वर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार ‘काल्पनिक’ आधार पर क्लब को बंद करना चाहती है. उन्होंने कहा कि क्लब में सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं और हर व्यक्ति की जांच होती है।
इस पूरे विवाद पर देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पुडुचेरी की पूर्व उपराज्यपाल किरन बेदी ने भी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि दिल्ली जिमखाना क्लब सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि देश की खेल और संस्थागत विरासत का हिस्सा है. किरण बेदी ने कहा कि यहां देश के बेहतरीन टेनिस मुकाबले हुए हैं और इस जगह से कई पीढ़ियों की यादें जुड़ी हुई हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस फैसले पर दोबारा विचार करेगी।
पूर्व रॉ प्रमुख और क्लब के पूर्व अध्यक्ष एएस दुलत ने कहा कि सदस्य सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करने के लिए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं. वहीं इतिहासकार स्वप्ना लिडले ने क्लब के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आजादी से पहले यह ब्रिटिश अधिकारियों का क्लब हुआ करता था, लेकिन 1945 के बाद भारतीयों को भी सदस्यता मिलने लगी. उन्होंने कहा कि विभाजन के समय पाकिस्तान जा रहे अधिकारियों के लिए यहां कई विदाई समारोह भी आयोजित हुए थे।
अब यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद बनता जा रहा है. आने वाले दिनों में दिल्ली हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई होने की संभावना है।






















