रायपुर/छत्तीसगढ़। अब्दुल सलाम क़ादरी
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। आरोप है कि वन प्रबंधन समितियों और विभागीय खातों के जरिए लाखों-करोड़ों रुपये का लेन-देन किया गया, लेकिन जब इन मामलों में जानकारी सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई, तो अधिकारियों द्वारा RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) और धारा 11 का हवाला देकर जानकारी देने से इंकार कर दिया गया।
सूत्रों के अनुसार, कई जिलों में वन समितियों के खातों में बड़ी रकम जमा कर निकासी की गई है। इन लेन-देन में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब उन्होंने दस्तावेज, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान विवरण और संबंधित प्रस्तावों की प्रतियां मांगीं, तो विभाग ने “तृतीय पक्ष की गोपनीयता” का हवाला देकर जानकारी दबा दी।
क्या कहती हैं संबंधित धाराएं?
- धारा 8(1)(j): यह धारा “व्यक्तिगत जानकारी” (Personal Information) को सार्वजनिक करने से रोकती है, यदि उसका सार्वजनिक हित से कोई संबंध न हो या इससे व्यक्ति की निजता प्रभावित होती हो।
- धारा 11: यह “तृतीय पक्ष” (Third Party) से संबंधित जानकारी के खुलासे से पहले उनकी सहमति लेने की प्रक्रिया बताती है।
कैसे हो रहा है दुरुपयोग?
विशेषज्ञों का मानना है कि इन धाराओं का उद्देश्य व्यक्तिगत गोपनीयता की रक्षा करना है, लेकिन छत्तीसगढ़ फॉरेस्ट में इन्हीं का इस्तेमाल कर वित्तीय लेन-देन, सरकारी फंड के उपयोग और समितियों के खातों की जानकारी छुपाई जा रही है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि:
- सरकारी पैसे के उपयोग को “निजी जानकारी” बताकर रोका जा रहा है
- तृतीय पक्ष का हवाला देकर फाइलों को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा
- बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ी को छिपाने की कोशिश हो रही है
बड़ा सवाल: पारदर्शिता या संरक्षण?
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में उठ रहे इन सवालों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या “गोपनीयता” का कानून भ्रष्टाचार को ढकने का हथियार बनता जा रहा है?
यदि आरोप सही हैं, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब देखना होगा कि राज्य सरकार और सूचना आयोग इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या फिर गोपनीयता की आड़ में यह मामला भी दब जाएगा?






















