कोलकाता/पश्चिम बंगाल —
हर साल बक़रीद के मौके पर पश्चिम बंगाल में पशुओं की खरीद-फरोख्त का कारोबार अपने चरम पर रहता है। राज्य के अलग-अलग जिलों की पशु मंडियों में लाखों की संख्या में बकरे, भैंस और अन्य पशु खरीदे-बेचे जाते हैं। इस कारोबार से किसान, पशुपालक, ट्रांसपोर्टर, चारा व्यापारी और छोटे दुकानदारों सहित लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी रहती है।
लेकिन इस बार कई मंडियों से सुस्त कारोबार और खरीदारों की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। पशु व्यापार से जुड़े लोगों का दावा है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो कारोबार को 40 से 50 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि इस आंकड़े की कोई आधिकारिक सरकारी पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पहले जहां बक़रीद से कई हफ्ते पहले मंडियों में भारी भीड़ दिखाई देती थी, वहीं इस बार कई बाजारों में सन्नाटा नजर आ रहा है। व्यापारी इसे बढ़ती प्रशासनिक सख्ती, परिवहन में दिक्कत, कानूनी कार्रवाई के डर और कमजोर मांग से जोड़ रहे हैं। कुछ व्यापारियों का यह भी कहना है कि मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से द्वारा पशु खरीद कम किए जाने से बाजार पर सीधा असर पड़ा है।
सबसे ज्यादा असर किन पर?
दिलचस्प बात यह है कि इस कारोबार से जुड़े बड़ी संख्या में पशुपालक और व्यापारी हिंदू समुदाय से आते हैं। ग्रामीण इलाकों में कई किसान पूरे साल पशुओं को पालते हैं और बक़रीद के मौसम में अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद रखते हैं। ऐसे में बाजार कमजोर पड़ने से सबसे बड़ा आर्थिक झटका इन्हीं छोटे व्यापारियों और किसानों को लगने की आशंका जताई जा रही है।
पशुपालन भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार लाखों परिवार अपनी आय के लिए पशुपालन और डेयरी गतिविधियों पर निर्भर हैं।
मंडियों में क्या कह रहे व्यापारी?
कई व्यापारियों का कहना है कि:
- पशुओं की ढुलाई महंगी हो गई है
- कई जगहों पर जांच और कार्रवाई का डर बना हुआ है
- खरीदार पहले की तुलना में कम आ रहे हैं
- छोटे व्यापारियों का पैसा फंसने लगा है
व्यापारियों का आरोप है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो हजारों परिवार आर्थिक संकट में आ सकते हैं।
जिम्मेदार कौन?
इस सवाल पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।
कुछ लोग प्रशासनिक नीतियों और सख्ती को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो कुछ बदलते सामाजिक माहौल और धार्मिक अपीलों को वजह बता रहे हैं। वहीं कई जानकारों का कहना है कि आर्थिक मंदी, बढ़ती महंगाई और लोगों की घटती क्रय क्षमता भी इसके पीछे बड़ा कारण हो सकती है।
फिलहाल स्थिति पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि बक़रीद नजदीक आते ही यह साफ होगा कि बंगाल की पशु मंडियां फिर से गुलजार होती हैं या कारोबारियों का नुकसान और बढ़ता है।






















