August 8, 2026 1:04 am

“उमरिया में रेत माफियाओं का राज! नदी-नाले छलनी, जंगल खाली और प्रशासन मौन”

  • बांधवगढ़ के जंगलों से लेकर नदी-नालों तक रेत का खेल, आखिर कलेक्टर और खनिज विभाग की आंखें क्यों बंद?

अब्दुल सलाम क़ादरी-विशेष खोजी रिपोर्ट

भोपाल। उमरिया जिला इन दिनों अवैध रेत उत्खनन के गंभीर आरोपों से घिरा हुआ है। जिले के विभिन्न नदी-नाले, वन क्षेत्र और संवेदनशील पर्यावरणीय इलाकों में बड़े पैमाने पर रेत निकासी की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई प्रभावशाली नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है, जबकि रेत माफिया खुलेआम प्राकृतिक संसाधनों की लूट में लगे हुए हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि उमरिया जिले से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में रेत पड़ोसी जिलों और अन्य राज्यों तक भेजी जा रही है। सवाल यह है कि यदि रेत परिवहन और भंडारण पूरी तरह वैध है, तो फिर खनिज विभाग और जिला प्रशासन इस पूरे नेटवर्क की सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं जारी कर रहा?

15 जून के बाद खनन प्रतिबंध, फिर भी जारी उत्खनन?

पर्यावरण संरक्षण और मानसून के दौरान नदी पारिस्थितिकी की सुरक्षा को देखते हुए कई राज्यों में मानसून अवधि में नदी से रेत उत्खनन पर प्रतिबंध लगाया जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और विभिन्न पर्यावरणीय दिशानिर्देश भी मानसून के दौरान नदी तंत्र की सुरक्षा पर जोर देते हैं। कई मामलों में जून से अक्टूबर तक नदी तल से खनन रोकने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके बावजूद उमरिया जिले में नदी-नालों से रेत निकासी और भारी मात्रा में रेत भंडारण की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रतिबंध लागू होने से पहले ही हजारों घनमीटर रेत अवैध रूप से स्टॉक कर ली गई और अब भी कई स्थानों पर उत्खनन जारी है।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और वन क्षेत्रों में खनन के आरोप

सबसे गंभीर आरोप बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और उमरिया वन मंडल के अंतर्गत आने वाले नदी-नालों से जुड़े हैं। यदि संरक्षित वन क्षेत्रों या पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में बिना वैधानिक अनुमति के रेत निकासी हुई है, तो यह वन एवं पर्यावरण कानूनों का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है।

कानून क्या कहता है?

भारत सरकार की सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस-2016 का उद्देश्य नदियों की प्राकृतिक संरचना, जैव विविधता और भूजल संरक्षण करना है। इन दिशा-निर्देशों में वैज्ञानिक सर्वे, पर्यावरणीय स्वीकृति और नियंत्रित उत्खनन पर जोर दिया गया है।

एनफोर्समेंट एंड मॉनिटरिंग गाइडलाइंस फॉर सैंड माइनिंग-2020 में अवैध खनन रोकने के लिए जीपीएस ट्रैकिंग, ऑनलाइन निगरानी, स्टॉक यार्ड सत्यापन, रॉयल्टी जांच और तकनीकी मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।

एमएमडीआर एक्ट, 1957 की धारा 23C राज्य सरकारों को अवैध खनन, परिवहन और भंडारण रोकने के लिए नियम बनाने का अधिकार देती है।

सबसे बड़ा सवाल: कार्रवाई क्यों नहीं?

यदि जिले में अवैध रेत उत्खनन नहीं हो रहा, तो प्रशासन निम्न सवालों के जवाब सार्वजनिक क्यों नहीं करता?

  • जिले में वर्तमान में वैध रेत भंडारण स्थलों की संख्या कितनी है?
  • प्रत्येक स्टॉक यार्ड में कितनी मात्रा में रेत जमा है?
  • 15 जून के बाद कितनी जांच और जब्ती की कार्रवाई हुई?
  • बांधवगढ़ और वन क्षेत्रों में खनन की शिकायतों की जांच किस स्तर पर पहुंची?
  • जिले से बाहर भेजी जा रही रेत की वैध रॉयल्टी और ट्रांजिट पास का विवरण क्या है?

जनता पूछ रही है…

उमरिया की जनता पूछ रही है कि क्या जिले के नदी-नाले और जंगल रेत माफियाओं के हवाले कर दिए गए हैं? क्या प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है? क्या खनिज विभाग और जिम्मेदार अधिकारी अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं या फिर अवैध कारोबार पर पर्दा डाला जा रहा है?

जब तक जिला प्रशासन, खनिज विभाग और संबंधित एजेंसियां पारदर्शी जांच कर तथ्य सार्वजनिक नहीं करतीं, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि आखिर उमरिया के नदी-नालों को छलनी करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?

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Author: BBC LIVE

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