अब्दुल सलाम कादरी-9424257566
अजमेर।हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह, अजमेर शरीफ़ में हर साल मुल्क और दुनिया भर से लाखों ज़ायरीन अकीदत के साथ हाज़िरी देते हैं। नक़द रक़म, चादर, सोना, चाँदी और दूसरी क़ीमती नज़र-ओ-नियाज़ दरगाह में पेश की जाती है। माना जाता है कि हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर यह रकम जाती कहाँ है? क्या इस पर हुकूमत का इख़्तियार है, दरगाह कमेटी इसका इंतज़ाम करती है या फिर खादिमों तक इसका बड़ा हिस्सा पहुँचता है?
कानून क्या कहता है?
दर्गाह ख़्वाजा साहब एक्ट, 1955 के मुताबिक़ दरगाह के आधिकारिक दानपात्र, काउंटर या इंतज़ामिया के ज़रिये मिलने वाले चढ़ावे का इंतज़ाम केंद्र सरकार के तहत गठित दरगाह कमेटी करती है। जबकि अगर कोई ज़ायरीन किसी खादिम को सीधे नज़राना या हदिया देता है, तो वह अलग व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है।
यानी हुकूमत इस रकम की मालिक नहीं होती, बल्कि कानून के तहत गठित कमेटी उसके इंतज़ाम, हिसाब-किताब और निगरानी की ज़िम्मेदार होती है।
करोड़ों की आमदनी… मगर अवाम को क्या हासिल?
दरगाह इंतज़ामिया का कहना है कि चढ़ावे की रकम उर्स के इंतज़ामात, दरगाह की देखरेख और दूसरे दीनी व इंतज़ामी कामों पर खर्च की जाती है।
लेकिन अवाम के ज़ेहन में कई सवाल बरसों से मौजूद हैं। अगर हर साल करोड़ों रुपये की आमदनी होती है, तो उसका असर समाज में कहाँ नज़र आता है?
ज़मीनी स्तर पर कई लोगों का दावा है कि चढ़ावे का बड़ा हिस्सा उर्स के इंतज़ामात और दरगाह की मरम्मत व रखरखाव तक ही सीमित दिखाई देता है। वहीं मदारिस (स्कूल), तालीमी वज़ीफ़े (छात्रवृत्ति), ग़रीबों की बाक़ायदा इमदाद और अस्पताल या डिस्पेंसरी जैसी फ़लाही (जनकल्याणकारी) गतिविधियाँ उस पैमाने पर नज़र नहीं आतीं, जिसकी तवक़्क़ो करोड़ों के चढ़ावे से की जाती है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
अहम सवाल
- हर साल दरगाह में कुल कितनी रकम और कितनी क़ीमती नज़र-ओ-नियाज़ आती है?
- क्या उसका पूरा हिसाब अवाम के सामने पेश किया जाता है?
- खादिमों को मिलने वाले निजी नज़रानों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है?
- दरगाह कमेटी की सालाना ऑडिट रिपोर्ट और आमदनी-खर्च का पूरा ब्योरा आसानी से सार्वजनिक क्यों नहीं होता?
- करोड़ों के चढ़ावे से फ़लाही कामों पर वास्तव में कितना खर्च किया जाता है?
ख़ुलासा
अजमेर शरीफ़ सिर्फ़ एक दरगाह नहीं, बल्कि करोड़ों अकीदतमंदों की रूहानी मरकज़ है। इसलिए जितनी अहमियत अकीदत की है, उतनी ही अहमियत शफ़्फ़ाफ़ियत (पारदर्शिता) की भी है। अगर दरगाह में आने वाले करोड़ों रुपये के चढ़ावे का सालाना हिसाब, ऑडिट और खर्च का पूरा ब्योरा अवाम के सामने नियमित तौर पर रखा जाए, तो न सिर्फ़ शंकाएँ दूर होंगी बल्कि ज़ायरीन का एतमाद भी और मज़बूत होगा।





















