अब्दुल सलाम क़ादरी-9424257566
कटघोरा/कोरबा। छत्तीसगढ़ में एक समय जैव ईंधन (बायोफ्यूल) और हरित विकास के नाम पर रतनजोत (जेट्रोफा) वृक्षारोपण का बड़ा अभियान चलाया गया था। उस दौर में प्रदेशभर में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर हजारों हेक्टेयर में रतनजोत लगाया गया। वर्षों तक इसे सरकार की महत्वाकांक्षी योजना और सफल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन अब वही रतनजोत के पौधे काटकर नए वृक्षारोपण किए जाने से योजना की उपयोगिता और उस पर हुए सरकारी खर्च को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, वन मण्डल कटघोरा के वन परिक्षेत्र पसान, सर्किल सेमरा, परिसर सैला-कटेलामुड़ा के आरक्षित वन क्षेत्र में लगभग 100 हेक्टेयर में वर्ष 2008-09 के दौरान रतनजोत का वृक्षारोपण किया गया था। अब वर्ष 2025-26 में उसी वृक्षारोपण को काटकर नए पौधों का रोपण किया जा रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसी वृक्षारोपण को वर्ष 2008-09 में उत्कृष्ट कार्य मानते हुए तत्कालीन कोरबा कलेक्टर अशोक अग्रवाल द्वारा 15 अगस्त के अवसर पर आयोजित समारोह में वनपाल कोमल शर्मा को उत्कृष्ट वृक्षारोपण पुरस्कार प्रदान किया गया था। उस समय तत्कालीन वन मण्डलाधिकारी कपासी भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। यदि यह वृक्षारोपण इतना उत्कृष्ट था कि उसे सम्मानित किया गया, तो आज उसे पूरी तरह काटने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह प्रश्न अब स्थानीय लोगों और पर्यावरण से जुड़े जानकारों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
इसी प्रकार वर्ष 2007-08 में वन परिक्षेत्र पसान के परिसर सेमरा बीट में किए गए रतनजोत वृक्षारोपण को भी काटकर वर्ष 2022-23 में नया वृक्षारोपण कर दिया गया। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या राज्यभर में रतनजोत परियोजना पर खर्च की गई भारी-भरकम राशि का कोई दीर्घकालिक मूल्यांकन कभी किया गया?
यदि करोड़ों रुपये की लागत से लगाए गए पौधों को कुछ वर्षों बाद ही हटाकर पुनः नए वृक्षारोपण किए जा रहे हैं, तो यह जानना आवश्यक है कि क्या रतनजोत परियोजना विफल रही, क्या इसके लिए किसी अधिकारी या एजेंसी की जवाबदेही तय हुई, अथवा बिना समुचित मूल्यांकन के सरकारी धन खर्च कर दिया गया?
अब इस पूरे मामले में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से यह जानकारी मांगी जा रही है कि रतनजोत वृक्षारोपण को काटने की अनुमति किस सक्षम प्राधिकारी ने दी, क्या शासन से विधिवत स्वीकृति प्राप्त हुई थी, तथा पुराने वृक्षारोपण को हटाने के पीछे क्या तकनीकी या प्रशासनिक कारण दर्ज किए गए हैं।
यदि जांच में यह सामने आता है कि बिना सक्षम अनुमति के करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों को हटाया गया अथवा परियोजना के मूल्यांकन में गंभीर लापरवाही हुई, तो यह मामला केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग और जवाबदेही का बड़ा विषय बन सकता है।





















