August 14, 2026 1:30 am

मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के घोटालों में घुसा ‘वायरस’! जांच की हर कोशिश क्यों हो रही नाकाम?

अब्दुल सलाम क़ादरी। मनेन्द्रगढ़। मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में कथित घोटालों और अनियमितताओं को लेकर उठ रहे सवाल अब सिर्फ किसी एक अधिकारी या किसी एक फाइल तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला जिस तरह शिकायतों, आरटीआई दस्तावेजों और जमीनी स्तर पर सामने आए तथ्यों से जुड़ता जा रहा है, उसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मनेन्द्रगढ़ वन मण्डल के घोटाले में वायरस घुस गया है और यह वायरस इतना मजबूत है कि घोटालों की जांच ही नही होने दे रहा है कई शिकायतें, आरटीआई दस्तावेज सहित जमीन से लेकर मंत्रालय तक पूरा का पूरा सिस्टम सड़ चुका है, अधिकारी आये और घोटाले किये और चले गए , वायरस ने इतना मजबूत मुकाम बना लिया है कि कोई भी माई का लाल इस वायरस को उखाड़ नही पा रहा है, डबल इंजन में घोटाले का यह वायरस मुख्यमंत्री को भी नजर नही आता, नेता प्रतिपक्ष भी इस मामले में खुलकर नही बोल पा रहे है,

आखिर ऐसा क्या है कि शिकायतें होने के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ती? सवाल यह भी है कि जब आरटीआई के माध्यम से दस्तावेज सामने आते हैं, तो उन दस्तावेजों की गंभीरता से जांच क्यों नहीं होती? क्या जिम्मेदार अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचने के बाद भी फाइलें सिर्फ कार्यालयों की अलमारियों में धूल फांकती रहती हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सब कुछ साफ है तो जांच से परेशानी किसे है?

वन विभाग में अधिकारी आते हैं, अपने कार्यकाल में फैसले लेते हैं, योजनाएं और निर्माण कार्य होते हैं, भुगतान होते हैं, और फिर अधिकारी स्थानांतरित होकर चले जाते हैं। लेकिन अगर उन कार्यों को लेकर सवाल उठते हैं तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों हो जाती है कि शिकायतकर्ता वर्षों तक जवाब का इंतजार करता रह जाता है?

मामला सिर्फ कागजों का नहीं है। जमीन पर काम की वास्तविक स्थिति, सरकारी धन का उपयोग, स्वीकृत कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका—इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच की जरूरत है।

आरटीआई दस्तावेज आखिर किसलिए होते हैं?

अगर सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेज किसी काम, भुगतान या प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं, तो उन दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लेकिन यहां आरोप यह है कि शिकायतों और दस्तावेजों के बावजूद जांच की गति ऐसी है मानो सिस्टम ने खुद अपने ऊपर ब्रेक लगा रखा हो।

यही वह कथित ‘वायरस’ है जिसकी चर्चा अब हो रही है—एक ऐसा सिस्टम, जिसमें शिकायत ऊपर जाती है, फिर दूसरी मेज पर जाती है, फिर किसी अधिकारी के पास पहुंचती है और अंततः मामला कार्रवाई के बजाय कागजी खानापूर्ति में उलझ जाता है।

जमीन से मंत्रालय तक सवाल ही सवाल

मामला यदि सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित होता तो शायद इसे आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन जब शिकायतें विभागीय अधिकारियों से होते हुए उच्च कार्यालयों और मंत्रालय तक पहुंचने की बात सामने आती है, तब सवाल और गंभीर हो जाता है।

क्या मंत्रालय तक पहुंचने वाली शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा होती है? क्या शिकायतकर्ता को कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी दी जाती है? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया जाता है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या शिकायतों में लगाए गए आरोपों का निष्पक्ष स्थल निरीक्षण कराया जाता है?

अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिलते तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सिस्टम किसे बचा रहा है?

डबल इंजन सरकार पर भी सवाल

प्रदेश और केंद्र में एक ही राजनीतिक विचारधारा की सरकार होने के बावजूद यदि किसी विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हो पा रही है, तो यह सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा करता है।

डबल इंजन सरकार में विकास और पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन अगर किसी वन मंडल में लगातार शिकायतें सामने आएं और जांच की मांग होती रहे, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिकायतों को दबाने के बजाय उनकी निष्पक्ष जांच हो।

सवाल मुख्यमंत्री से भी है—क्या मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में उठ रहे इन सवालों की भनक शासन तक पहुंच रही है?

और अगर पहुंच रही है तो कार्रवाई कब होगी?

नेता प्रतिपक्ष की चुप्पी भी सवालों के घेरे में

विपक्ष का काम केवल विधानसभा में सवाल उठाना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े गंभीर मामलों को मजबूती से सामने लाना भी है। ऐसे में मनेन्द्रगढ़ वन मंडल से जुड़े आरोपों पर विपक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल उठना लाजिमी है।

जब शिकायतकर्ता दस्तावेज लेकर दर-दर भटकने का दावा कर रहा हो, जब आरटीआई से जानकारी सामने आने की बात कही जा रही हो और जब विभागीय कार्यों पर लगातार सवाल उठ रहे हों, तब विपक्ष को भी इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग खुलकर करनी चाहिए।

अब जरूरत ‘वायरस’ की जांच की है

मनेन्द्रगढ़ वन मंडल के मामले में सबसे जरूरी सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि शिकायतों और दस्तावेजों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।

यदि आरोप गलत हैं तो निष्पक्ष जांच के बाद आरोपों को खारिज किया जाए। और यदि आरोपों में सच्चाई है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।

क्योंकि सरकारी पैसा जनता का है और वन संपदा भी जनता की है।

अब सवाल यह नहीं कि घोटाला हुआ या नहीं—सवाल यह है कि अगर घोटाला नहीं हुआ तो जांच से इतनी बेचैनी क्यों? और अगर हुआ है तो जांच रोकने वाला यह कथित ‘वायरस’ आखिर किसका संरक्षण पा रहा है?

मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में उठ रहे सवालों का जवाब अब फाइलों से नहीं, निष्पक्ष जांच और सार्वजनिक कार्रवाई से मिलना चाहिए।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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