रिपोर्ट: अब्दुल सलाम क़ादरी
छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र का सबसे ताकतवर हथियार माने जाने वाले सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005) को आज खुद सरकार, विभागीय अफसरशाही और राज्य सूचना आयोग मिलकर कमजोर करने में जुटे दिखाई दे रहे हैं। कानून की आत्मा पारदर्शिता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अफसर अब इसी कानून की धाराओं को तोड़-मरोड़कर भ्रष्टाचार छुपाने का औजार बना चुके हैं — और सरकार व आयोग आंख मूंदकर तमाशा देख रहे हैं।
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि आम नागरिक को सूचना मांगने पर न्याय नहीं, अपमान, टालमटोल और सालों की देरी मिल रही है। इससे साफ है कि छत्तीसगढ़ में RTI अब अधिकार नहीं, बल्कि अफसरों की दया पर निर्भर एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गया है।
धारा 8(1)(j) की गलत व्याख्या — भ्रष्टाचार ढकने का सरकारी हथियार
RTI Act की धारा 8(1)(j) केवल उन सूचनाओं पर रोक लगाने की अनुमति देती है जो —
✔️ व्यक्तिगत प्रकृति की हों
✔️ जिनका सार्वजनिक हित से कोई सरोकार न हो
✔️ जिनसे किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित हनन हो
लेकिन छत्तीसगढ़ के कई विभागों — खासकर वन विभाग — ने इस धारा को भ्रष्टाचार छुपाने की ढाल बना लिया है। सरकारी पैसे से मजदूरी भुगतान, फर्जी नामों से हाजिरी, सामग्री खरीदी, ठेके, टेंडर और भुगतान विवरण जैसी सूचनाओं को भी “निजी जानकारी” बताकर रोका जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग के अनेक निर्णय स्पष्ट कर चुके हैं कि —
सरकारी धन से जुड़ी हर जानकारी सार्वजनिक हित की श्रेणी में आती है।
फिर सवाल उठता है —
जब कानून इतना स्पष्ट है, तो अधिकारी सूचना क्यों रोक रहे हैं?
और जब अधिकारी कानून तोड़ रहे हैं, तो सरकार और आयोग चुप क्यों हैं?
मनेन्द्रगढ़ वन मंडल बना भ्रष्टाचार का मॉडल उदाहरण
इस पूरी अव्यवस्था का सबसे शर्मनाक उदाहरण मनेन्द्रगढ़ वन मंडल से सामने आया है, जहां वन मंडलाधिकारी मनीष कश्यप, उनके अधीन रेंजर और एसडीओ पर गंभीर आरोप हैं कि उन्होंने RTI कानून को जानबूझकर कुचलते हुए भ्रष्टाचार से जुड़ी सूचनाओं को छुपाया।
सूत्रों के मुताबिक —
🔸 मजदूरी भुगतान में फर्जी मजदूरों के नाम
🔸 हाजिरी रजिस्टर में हेराफेरी
🔸 सरकारी योजनाओं की राशि का गबन
🔸 सामग्री खरीदी में भारी अनियमितताएं
इन सभी मामलों में सूचना मांगे जाने पर अधिकारियों ने धारा 8(1)(j) का हवाला देकर जवाब देने से साफ इंकार कर दिया, जबकि यह मामला सीधा-सीधा सरकारी धन और भ्रष्टाचार से जुड़ा है।
यह न केवल RTI कानून का उल्लंघन है बल्कि लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
धारा 8(2) की खुली अवहेलना — भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की साजिश
RTI Act की धारा 8(2) साफ कहती है —
यदि मांगी गई सूचना से भ्रष्टाचार उजागर होता है या मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी हो, तो उसे धारा 8(1) के किसी भी अपवाद के बावजूद देना अनिवार्य होगा।
यानि —
भ्रष्टाचार के मामलों में कोई भी बहाना स्वीकार्य नहीं।
इसके बावजूद मनेन्द्रगढ़ समेत कई वन मंडलों में अधिकारी जानबूझकर धारा 8(2) की अवहेलना कर रहे हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है।
अब बड़ा सवाल यह है —
जब अफसर खुलेआम कानून तोड़ रहे हैं, तो सरकार और आयोग उन्हें संरक्षण क्यों दे रहे हैं?
धारा 10 की हत्या — सूचना पृथक्करण का अधिकार भी छीना गया
RTI Act की धारा 10 (Severability Clause) कहती है —
यदि किसी दस्तावेज का कुछ हिस्सा गोपनीय हो और बाकी हिस्सा सार्वजनिक किया जा सकता हो, तो गोपनीय अंश हटाकर शेष सूचना देना अनिवार्य है।
लेकिन छत्तीसगढ़ के वन विभाग में इस धारा को पूरी तरह रौंद दिया गया है। अधिकारी या तो पूरी सूचना रोक लेते हैं या गोलमोल जवाब देकर आवेदनकर्ता को गुमराह कर देते हैं।
यह व्यवहार साफ संकेत देता है कि सूचना रोकना अब प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित रणनीति बन चुका है।
प्रथम अपीलीय अधिकारी भी बने संरक्षणदाता
RTI प्रक्रिया का दूसरा चरण — प्रथम अपील — नागरिकों के लिए न्याय का पहला दरवाजा होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह दरवाजा अब लगभग बंद कर दिया गया है।
प्रथम अपीलीय अधिकारी —
❌ बिना जांच किए PIO के जवाब की पुष्टि कर देते हैं
❌ कानून की धाराओं का विश्लेषण नहीं करते
❌ आवेदक को राहत देने के बजाय फाइल को राज्य सूचना आयोग भेजकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं
इससे साफ है कि पूरा सिस्टम एक-दूसरे को बचाने में जुटा हुआ है।
राज्य सूचना आयोग — न्याय का कब्रिस्तान बनता संस्थान?
RTI कानून की आत्मा है — त्वरित न्याय।
लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग की स्थिति यह है कि —
📌 सुनवाई में 2 से 3 साल तक की देरी
📌 हजारों अपीलें लंबित
📌 आदेशों में अस्पष्टता और ढिलाई
📌 दोषी अधिकारियों पर शायद ही कोई दंड
यह सवाल उठना स्वाभाविक है —
क्या राज्य सूचना आयोग नागरिकों के अधिकार की रक्षा के लिए बना था या अफसरों को बचाने के लिए?
जब आयोग वर्षों तक मामलों को लटकाए रखता है, तो भ्रष्ट अधिकारी आराम से सबूत मिटा देते हैं, रिकॉर्ड बदल देते हैं और पैसा ठिकाने लगा देते हैं। फिर आयोग की सुनवाई केवल एक औपचारिक खानापूर्ति बनकर रह जाती है।
लाखों की मजदूरी “गोपनीयता” में हजम — सरकार की चुप्पी क्यों?
वन विभाग में मजदूरी भुगतान, फर्जी हाजिरी और योजनागत राशि के गबन की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं। लेकिन जब नागरिक RTI के जरिए इन खर्चों का विवरण मांगते हैं, तो जवाब मिलता है —
“यह व्यक्तिगत सूचना है, धारा 8(1)(j) के तहत नहीं दी जा सकती।”
यह तर्क अपने आप में संविधान, कानून और लोकतंत्र तीनों का मजाक है।
सरकारी पैसे से दी गई मजदूरी कैसे निजी हो सकती है?
सरकारी योजनाओं का खर्च कैसे गोपनीय हो सकता है?
और अगर यह सब सार्वजनिक नहीं है, तो फिर RTI कानून बना ही क्यों?
EOW की चुप्पी — संरक्षण या मिलीभगत?
इतना सब कुछ सामने आने के बावजूद आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) की भूमिका लगभग शून्य नजर आती है। न कोई बड़ी जांच, न किसी वरिष्ठ अधिकारी पर कार्रवाई, न किसी घोटालेबाज पर सख्त कानूनी शिकंजा।
यह स्थिति गंभीर सवाल खड़े करती है —
❓ क्या भ्रष्ट अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है?
❓ क्या जांच एजेंसियां जानबूझकर आंख मूंदे बैठी हैं?
❓ क्या छत्तीसगढ़ में ईमानदार नागरिक होना अब अपराध बन चुका है?
सरकार पर सीधा हमला — जवाबदेही से भाग क्यों रही है सत्ता?
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि राज्य सरकार इस पूरे मामले पर पूरी तरह मौन है। न कोई सर्कुलर, न कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश, न कोई प्रशिक्षण व्यवस्था, न कोई जवाबदेही तय की गई।
जबकि सरकार की जिम्मेदारी थी कि —
✔️ धारा 8(1)(j) की स्पष्ट व्याख्या जारी करती
✔️ अधिकारियों को धारा 8(2) और 10 का पालन करने के निर्देश देती
✔️ गलत सूचना रोकने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई करती
✔️ राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार करती
लेकिन सरकार ने इसके बजाय चुप्पी को नीति बना लिया है।
यह चुप्पी अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी से पलायन बन चुकी है।
कानून की धज्जियां — लोकतंत्र पर सीधा हमला
RTI अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि —
नागरिक और सरकार के बीच भरोसे की आखिरी कड़ी है।
जब इस कानून को ही कमजोर किया जाए, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है। आज छत्तीसगढ़ में हालात यह हैं कि —
🔻 सूचना मांगना संघर्ष बन चुका है
🔻 भ्रष्टाचार उजागर करना जोखिम बन चुका है
🔻 न्याय पाना वर्षों की लड़ाई बन चुका है
यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राज्य के लिए खतरनाक संकेत है।
अब सवाल सरकार और आयोग से सीधे-सीधे
1️⃣ जब कानून कहता है कि भ्रष्टाचार से जुड़ी सूचना देना अनिवार्य है, तो अधिकारी उसे क्यों रोक रहे हैं?
2️⃣ जब प्रथम अपीलीय अधिकारी गलत आदेश दे रहे हैं, तो सरकार उन पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही?
3️⃣ जब राज्य सूचना आयोग वर्षों तक मामले लटकाए बैठा है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
4️⃣ जब सरकारी धन की लूट सामने आ रही है, तो EOW और सतर्कता विभाग क्यों मौन हैं?
5️⃣ क्या छत्तीसगढ़ में RTI अब सिर्फ कागज़ी अधिकार बनकर रह गया है?
RTI नहीं बची, सिर्फ फाइलों में जिंदा है
आज छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार अधिनियम भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों के बचाव का कवच बन चुका है। सरकार की चुप्पी, आयोग की सुस्ती और अफसरों की मनमानी ने इस कानून को लगभग अप्रभावी कर दिया है।
अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में RTI आवेदन करना भी व्यर्थ होगा, क्योंकि —
जब सूचना देने वाला ही कानून तोड़ने लगे
और न्याय देने वाला ही देर करे
तो लोकतंत्र केवल किताबों में बचता है, ज़मीन पर नहीं।
अब वक्त आ गया है कि सरकार, सूचना आयोग और प्रशासन यह तय करें कि वे नागरिकों के साथ खड़े हैं या भ्रष्टाचारियों के साथ?






















