मुंबई
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोमवार को कहा कि अजित पवार ऐसे नेता थे जो महाराष्ट्र के सबसे अच्छे मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन राज्य को उनका नेतृत्व उस रूप में कभी नहीं मिल पाया। उनके जाने से एक खालीपन पैदा हो गया है और अब वैक्यूम शब्द का असली मतलब समझ में आ रहा है। विधानसभा में बजट सत्र के पहले दिन शोक प्रस्ताव के दौरान अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस खालीपन को भर पाना नामुमकिन है। उन्होंने कहा कि “दादा” जैसा नेता फिर कभी देखने को नहीं मिलेगा। फडणवीस ने बताया कि विधानसभा सत्र के दौरान अजित पवार हमेशा सबसे पहले विधान भवन पहुंचते थे और अपनी सीट पर मौजूद रहते थे। सदन की कार्यवाही कितनी भी लंबी क्यों न चले, वह अंत तक अपनी जगह पर डटे रहते थे। यह बहुत पीड़ादायक है कि अब वह हमारे बीच नहीं हैं।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि इस वर्ष अजित पवार अपना 12वां बजट पेश करते और अगले साल 13वां बजट पेश कर बैरिस्टर शेषराव वानखेड़े के रिकॉर्ड की बराबरी कर लेते, लेकिन उससे पहले ही उनका निधन हो गया। इस बार बजट पेश करने की जिम्मेदारी खुद संभाल रहे फडणवीस ने कहा कि बजट के मामले में अजित पवार कभी भी कठिन फैसले लेने से पीछे नहीं हटते थे। उन्होंने याद दिलाया कि जब वित्त विभाग ने ‘लड़की बहिन’ योजना पर भारी आर्थिक बोझ का हवाला देते हुए दोबारा विचार करने का सुझाव दिया था, तब भी अजित पवार अपने फैसले पर कायम रहे और यह सुनिश्चित किया कि योजना शुरू की जाए।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “लड़की बहन योजना शुरू होने के बाद अजित पवार ने गुलाबी जैकेट पहनना शुरू कर दिया था। उन्होंने हमें भी वह जैकेट पहनाई थी। अब ये बातें सिर्फ यादें बनकर रह गई हैं। यह शोक प्रस्ताव लाना मेरी संवैधानिक जिम्मेदारी है, लेकिन मेरे लिए यह बहुत भावुक क्षण है।”
महाकवि भास के नाटक स्वप्नवासवदत्तम की एक पंक्ति का उल्लेख करते हुए फडणवीस ने कहा कि अजित पवार का जाना केवल राजनीतिक नुकसान नहीं है, बल्कि यह उनके लिए गहरा व्यक्तिगत दुख भी है।
उन्होंने कहा, “कहते हैं समय हर घाव भर देता है, लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो कभी कम नहीं होते, चाहे कितना भी समय बीत जाए। यह वैसा ही दर्द है। किसी नेता के जाने के बाद हम अक्सर कहते हैं कि एक ‘खालीपन’ बन गया है, लेकिन जब अजित दादा जैसे नेता चले जाते हैं, तब सच में उस शब्द का मतलब समझ में आता है। उनकी जगह कोई और नहीं ले सकता।”
मुख्यमंत्री ने एक प्रेरक पंक्ति भी दोहराई, “काम को जिंदगी दो और मौत को आराम।” उन्होंने अजित पवार को ऐसा नेता बताया, जिसने अपने जीवन का हर पल काम के लिए समर्पित किया और हर काम की योजना बनाई।
फडणवीस ने कहा, “हम दोनों का जन्म 22 जुलाई को हुआ था। वह मुझसे 11 साल बड़े थे, इसलिए सच मायनों में मेरे ‘दादा’ थे। हमारी दस साल से अधिक समय तक गहरी दोस्ती रही। हम 1999 में मिले थे लेकिन 2014 के बाद हमारे बीच एक भावनात्मक रिश्ता बन गया। मैं एनसीपी को राजनीतिक सहयोगी मानता था, लेकिन अजित दादा को हमेशा भावनात्मक रूप से करीब माना।”
उन्होंने 2019 में सरकार गठन से जुड़े विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि अजित पवार ऐसे नेता थे, जो हर स्थिति में अपनी बात खुलकर रखते थे।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “2019 में सरकार बनाने का फैसला हुआ था, लेकिन बाद में उनके वरिष्ठ नेताओं ने अपना निर्णय बदल दिया, फिर भी क्योंकि उन्होंने मुझसे वादा किया था, उन्होंने उसे निभाने का फैसला किया। कई लोग इसे ‘सुबह-सुबह की शपथ’ कहते थे, लेकिन इस बात से दादा को चिढ़ होती थी। उनका कहना था कि ‘सुबह-सुबह’ का मतलब छह बजे होता है, जबकि हमने नौ बजे शपथ ली थी। उन्हें इस फैसले की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब सुप्रीम कोर्ट ने हमारे खिलाफ फैसला दिया, तब हम दोनों ‘वर्षा’ बंगले पर मौजूद थे। मैंने उनसे कहा था कि वे अपना निर्णय खुद लें, क्योंकि उन्हें अपने साथ जुड़े लोगों के भविष्य के बारे में भी सोचना है।”
फडणवीस ने आगे कहा कि अजित पवार समय के बेहद पाबंद नेता थे और उनका राजनीतिक सफर भी लंबा और प्रभावशाली रहा। उन्होंने भावुक होकर कहा, “दादा हमेशा समय का पूरा ध्यान रखते थे, लेकिन इस बार वे अपनी ही टाइमिंग से चूक गए। सबने उन्हें लंबी पारी खेलते देखा, लेकिन वे बहुत जल्दी हमें छोड़कर चले गए।” उन्होंने बताया कि अजित पवार छह बार उपमुख्यमंत्री रहे, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वे अक्सर मजाक में कहते थे, “मैं किसी दिन मुख्यमंत्री बनूंगा लेकिन अभी के लिए उपमुख्यमंत्री ही ठीक है।”
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