October 26, 2026 2:07 pm

चीन के 60,000 MW वाले डैम का जवाब बनेगा सियांग प्रोजेक्ट? आदिवासियों के विरोध से बढ़ा तनाव

अरुणाचल प्रदेश
अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ों से बहने वाली सियांग नदी- जो असम में जाकर विशाल ब्रह्मपुत्र बनती है, इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है। पीढ़ियों से आदिवासियों की जीवनरेखा रही इस नदी पर केंद्र और राज्य सरकार 11,200 मेगावाट का विशाल 'सियांग अपर बहुउद्देशीय प्रोजेक्ट' (SUMP) बनाना चाहती है। सरकार का तर्क है कि चीन की नापाक पानी वाली चालों का जवाब देने के लिए यह डैम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी है।

लेकिन नदी किनारे बसे आदिवासियों के लिए यह प्रोजेक्ट उनकी जमीन, संस्कृति और वजूद पर मंडराता सीधा खतरा है। विरोध की यह आग अब सड़कों पर उतर चुकी है। 23 अक्टूबर को पासीघाट में उग्र प्रदर्शनकारियों ने एनएचपीसी के दफ्तर और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसके बाद से पूरी सियांग घाटी में तनाव का माहौल है।

आखिर सरकार क्यों बना रही है यह प्रोजेक्ट?
इस विवाद को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। तिब्बत में चीन यारलुंग त्संगपो (सियांग) नदी पर मेडोग नाम का दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत प्रोजेक्ट बना रहा है, जिसकी क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट होगी। जुलाई 2025 में चीन ने इस प्रोजेक्ट पर औपचारिक काम शुरू किया था।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों और सरकार को डर है कि चीन तिब्बत से पानी के बहाव को रोक सकता है या फिर अचानक पानी छोड़कर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में भीषण तबाही ला सकता है।

मुख्यमंत्री पेमा खांडू का कहना है कि अगर चीन ने तिब्बत में 5.5 अरब घन मीटर पानी रोकने की क्षमता बनाई है, तो भारत को भी नीचे 9.2 अरब घन मीटर क्षमता वाला एक विशाल रिजर्वायर बनाना पड़ेगा। इससे अगर चीन अचानक पानी छोड़ता भी है, तो यह बांध एक 'स्ट्रैटेजिक बफर' की तरह काम करेगा और असम-अरुणाचल को बाढ़ से बचाएगा।
विस्थापन, भूकंप और वजूद का खतरा: स्थानीय लोग क्यों कर रहे हैं विरोध?

सरकार चाहे इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताए, लेकिन सियांग स्वदेशी किसान मंच (SIFF) और 'आदि' समुदाय के स्थानीय लोग इसे अपने विनाश की शुरुआत मान रहे हैं।

स्थानीय लोगों को डर है कि इस विशालकाय बांध के बनने से उनकी उपजाऊ खेती, पुश्तैनी गांव और सांस्कृतिक धरोहर पानी में समा जाएगी।

पूर्वी हिमालय का यह पूरा इलाका बेहद संवेदनशील और भूकंप-संभावित माना जाता है। ऐसे में इतना विशाल डैम किसी भी बड़े प्राकृतिक हादसे का कारण बन सकता है।

सरकार कह रही है कि अभी सिर्फ 'प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट' (PFR) यानी शुरुआती जांच हो रही है, निर्माण का फैसला नहीं हुआ है। लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एक बार सर्वे की इजाजत दी, तो सरकार पीछे मुड़कर नहीं देखेगी।

मानवाधिकार कार्यकर्ता और पर्यावरणविद इबो मिली का कहना है कि चीन के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। सरकार को चीन के साथ जल-बंटवारा संधि करनी चाहिए, न कि अपने ही लोगों की जमीन छीनकर इतना बड़ा खतरा मोल लेना चाहिए।

2008 से अटका है प्रोजेक्ट, अब क्या है स्थिति?
सियांग नदी पर डैम बनाने की योजना नई नहीं है। 2008 में ही इसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना माना गया था। पहले यहां 6,000 मेगावाट और 3,750 मेगावाट की दो अलग-अलग परियोजनाएं बनाने की बात थी, जिसे बाद में मिलाकर 11,200 मेगावाट का यह विशाल मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट बना दिया गया।

विरोध के बढ़ते सुरों को देखते हुए मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने साफ किया है कि सरकार कोई जल्दबाजी नहीं कर रही है। नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच होने वाले सर्वे में अगर तकनीकी रूप से यह जगह उपयुक्त नहीं पाई गई, तो काम आगे नहीं बढ़ेगा। सीएम खांडू ने यहां तक कहा कि वे खुद प्रभावित गांवों में 10 दिन बिताकर लोगों की समस्याएं सुनने को तैयार हैं।

फिलहाल, पंचायती राज मंत्री ओजिंग तासिंग की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई है, लेकिन जिस तरह से पासीघाट में हिंसा भड़की है और केंद्र को रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) भेजनी पड़ी है, उससे साफ है कि जमीन पर लोगों का गुस्सा इतनी आसानी से शांत होने वाला नहीं है।

Editor
Author: Editor

विज्ञापन
error: Content is protected !!