अब्दुल सलाम कादरी
मनेन्द्रगढ़।
मनेन्द्रगढ़ वन मण्डल में खोंगापानी क्षेत्र में बरसाती नाले पर जेसीबी मशीन से दो तालाबों का निर्माण कराए जाने का मामला अब और भी गंभीर होता जा रहा है। इस पूरे कार्य में स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार नहीं दिया गया, जिससे न केवल नियमों की अनदेखी हुई बल्कि रोजगार सृजन के उद्देश्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, तालाब निर्माण का कार्य डिएफओ, रेंजर और एसडीओ की देखरेख में पूरी तरह मशीनों से कराया जा रहा है। जेसीबी के उपयोग से जहां एक ओर प्राकृतिक नाले के स्वरूप से छेड़छाड़ हो रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण मजदूरों को काम से वंचित कर दिया गया है। यदि यही कार्य श्रमिकों से कराया जाता, तो दर्जनों परिवारों को रोजगार मिल सकता था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब इस संबंध में सीसीएफ अम्बिकापुर को भी सूचना दी गई, तो वहां से भी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। वहीं, रेंजर कुर्रे को कई बार फोन कर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन उठाना तक उचित नहीं समझा। अधिकारियों की यह चुप्पी कहीं न कहीं पूरे मामले में मिलीभगत और लाखों रुपये के भ्रष्टाचार की आशंका को और मजबूत कर रही है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी बहरासी क्षेत्र में इसी तरह बरसाती नाले पर तालाब निर्माण जेसीबी और ट्रैक्टर से कराया गया था। उस समय भी न तो किसी प्रकार की जांच हुई और न ही जिम्मेदार रेंजर से कोई रिकवरी की गई। लगातार ऐसे मामलों का सामने आना यह दर्शाता है कि वन विभाग में नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि तालाब निर्माण की स्वीकृति, लागत और कार्य की प्रक्रिया की कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। न ग्राम सभा की सहमति ली गई और न ही स्थानीय लोगों को विश्वास में लिया गया। इससे विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि खोंगापानी और बहरासी दोनों मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, मशीनों से कराए गए कार्यों की लागत और भुगतान की जांच हो तथा दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही भविष्य में ऐसे सभी कार्य स्थानीय श्रमिकों से कराए जाएं, ताकि रोजगार और विकास दोनों का उद्देश्य पूरा हो सके।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और उच्च वन अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
डिएफओ का वर्जन
इस पूरे मामले में वन मण्डलाधिकारी (डिएफओ) मनीष कश्यप का पक्ष जानने के लिए कई बार फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनके द्वारा फोन नंबर ब्लॉक कर रखा गया है। ऐसे में उनका पक्ष सामने नहीं आ सका। जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह संपर्क से बचना विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर और भी सवाल खड़े करता है।
पीसीसीएफ श्रीनिवासन राव का भी इस मामले में पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उनके द्वारा भी फोन रिसीव नही किया गया
इसी कड़ी में विडीओ खबर भी जल्द…..






















