वाशिंगटन
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर संयुक्त राष्ट्र से बड़ी खबर सामने आ रही है. अमेरिकी समर्थन वाले एक प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वोटिंग टल गई है, जिससे बहरीन को बड़ा झटका लगा है. माना जा रहा है कि चीन, रूस और फ्रांस की रणनीतिक चालों ने इस प्रस्ताव को अटका दिया, जिससे अमेरिका की योजना फिलहाल अधर में लटक गई है।
होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश किए गए अहम प्रस्ताव पर शुक्रवार को होने वाली वोटिंग अचानक टाल दी गई. यह प्रस्ताव बहरीन की ओर से लाया गया था, जिसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त था. आधिकारिक तौर पर वोटिंग टालने की वजह ‘गुड फ्राइडे’ की छुट्टी बताई गई, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार इसके पीछे बड़ी शक्तियों के बीच मतभेद मुख्य कारण हैं. खासतौर पर चीन, रूस और फ्रांस की आपत्तियों ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया।
क्या था प्रस्ताव?
इस ड्राफ्ट प्रस्ताव में सदस्य देशों को होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षा के लिए ‘जरूरी रक्षात्मक बल’ इस्तेमाल करने की अनुमति देने की बात कही गई थी. इसमें यह भी प्रावधान था कि देश अकेले या बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाकर कार्रवाई कर सकते हैं।
इसका उद्देश्य ईरान की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा डालने की कोशिशों को रोकना और वैश्विक समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखना था।
क्यों फंसा मामला?
हालांकि इस प्रस्ताव को पास कराना आसान नहीं था. चीन और रूस ने साफ संकेत दे दिए थे कि वे इस तरह के प्रस्ताव का विरोध कर सकते हैं.
चीन के राजदूत ने कहा कि इस तरह बल प्रयोग की अनुमति देना स्थिति को और भड़का सकता है और गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं. वहीं रूस, जो ईरान का करीबी सहयोगी है, पहले से ही इस तरह के एकतरफा कदमों की आलोचना करता रहा है।
दूसरी ओर फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई थी. फ्रांस चाहता था कि किसी भी कार्रवाई को पूरी तरह ‘रक्षात्मक’ दायरे में रखा जाए और सैन्य हस्तक्षेप से बचा जाए।
अमेरिका और बहरीन को झटका
इस प्रस्ताव को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका और बहरीन काफी सक्रिय थे. बहरीन के राजदूत जमाल अल-रोवाईई ने इसे ‘अहम मोड़’ बताया था और कहा था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके असर को देखते हुए कार्रवाई जरूरी है. लेकिन वोटिंग टलने से यह साफ हो गया है कि सुरक्षा परिषद में आम सहमति बनाना आसान नहीं है।
होर्मुज संकट क्यों अहम?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से करीब 20% वैश्विक तेल और एलएनजी की सप्लाई गुजरती है।
इस समुद्री मार्ग पर ईरान की नाकेबंदी के कारण दुनियाभर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है और तेल-गैस की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है।
इतिहास में ऐसे फैसले कम
संयुक्त राष्ट्र की तरफ से सदस्य देशों को बल प्रयोग की अनुमति देने वाले प्रस्ताव बेहद कम होते हैं. 1990 में कुवैत पर इराक के हमले के बाद और 2011 में लीबिया में NATO कार्रवाई के दौरान ऐसे फैसले लिए गए थे.
होर्मुज संकट पर संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग टलना यह दिखाता है कि वैश्विक शक्तियों के बीच मतभेद कितने गहरे हैं. चीन, रूस और फ्रांस के रुख ने अमेरिका समर्थित प्रस्ताव को फिलहाल रोक दिया है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि आगे इस संकट का समाधान कूटनीति से निकलेगा या टकराव और बढ़ेगा।






















