October 25, 2026 2:27 am

RTI अपील पर घुमा-फिराकर आदेश! कैम्पा मद के भुगतान की जानकारी देने से बचता दिखा वन विभाग, तीसरे पक्ष का हवाला बना ढाल

  • RTI में ‘तीसरे पक्ष’ का सहारा लेकर सूचना रोकी गई? अपीलीय अधिकारी के आदेश पर उठे सवाल
  • RTI अपील पर घुमा-फिराकर आदेश! कैम्पा मद के भुगतान की जानकारी देने से बचता दिखा वन विभाग, तीसरे पक्ष का हवाला बना ढाल
  • वनमंडलाधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी ने सूचना देने के बजाय धारा 11 का हवाला देकर प्रकरण निपटाया, जबकि मांगी गई जानकारी सार्वजनिक धन के खर्च से जुड़ी थी।

बिलासपुर। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पत्रकार अब्दुल सलाम कादरी द्वारा मांगी गई कैम्पा मद के भुगतान संबंधी जानकारी पर बिलासपुर वनमंडल के प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं वनमंडलाधिकारी द्वारा पारित आदेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आदेश का अध्ययन करने पर यह प्रतीत होता है कि अपील में उठाए गए मूल प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देने के बजाय पूरे मामले को “तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी” का मामला बताकर घुमा-फिराकर निपटा दिया गया।

पत्रकार ने बेलगहना वन परिक्षेत्र में 1 जनवरी 2025 से मई 2026 तक कैम्पा मद से किए गए भुगतानों के वाउचर और कैशबुक की प्रतियां मांगी थीं। यह जानकारी सरकारी धन के व्यय से संबंधित थी, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित करना था।

अपीलीय अधिकारी ने क्या कहा?

दिनांक 01 जुलाई 2026 को पारित आदेश में अपीलीय अधिकारी ने कहा कि कैशबुक में भुगतान प्राप्तकर्ताओं के नाम, पता, खाता संख्या तथा अन्य व्यक्तिगत जानकारियां दर्ज हैं, इसलिए यह सूचना सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत तीसरे पक्ष से संबंधित है और सीधे उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।

आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों तथा बैंक खातों से संबंधित उदाहरणों का उल्लेख करते हुए सूचना देने से इनकार किया गया।

उठ रहे हैं ये बड़े सवाल

इस आदेश को लेकर सूचना के अधिकार के जानकार कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठा रहे हैं—

  • यदि रिकॉर्ड में व्यक्तिगत जानकारी है, तो क्या उसे ब्लैकआउट (Masking/Redaction) करके शेष सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा सकती थी?
  • सरकारी धन से हुए भुगतान का विवरण क्या पूरी तरह निजी सूचना माना जा सकता है?
  • यदि धारा 11 लागू होती भी है, तो क्या तीसरे पक्ष की प्रक्रिया पूरी कर सूचना देने अथवा अस्वीकार करने का स्पष्ट निर्णय नहीं होना चाहिए था?
  • अपील में मांगे गए प्रत्येक बिंदु पर अलग-अलग निर्णय देने के बजाय पूरा मामला एक ही आधार पर क्यों समाप्त कर दिया गया?

पारदर्शिता बनाम गोपनीयता

सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य सरकारी खर्च में पारदर्शिता लाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित अभिलेखों में यदि कुछ व्यक्तिगत जानकारी हो तो उसे छिपाकर शेष रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जा सकता है। कई मामलों में केंद्रीय सूचना आयोग भी इसी सिद्धांत का पालन करता रहा है।

द्वितीय अपील का रास्ता खुला

आदेश में स्वयं उल्लेख किया गया है कि यदि अपीलकर्ता आदेश से संतुष्ट नहीं है तो वह छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत कर सकता है। अब यह देखना होगा कि सूचना आयोग इस मामले में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है।

प्रथम दृष्टया आदेश पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि अपील में उठाए गए मूल मुद्दे—सरकारी धन के भुगतान संबंधी अभिलेख उपलब्ध कराने—पर स्पष्ट निर्णय देने के बजाय पूरा मामला तीसरे पक्ष की सूचना के दायरे में बताकर समाप्त कर दिया गया। हालांकि, इस आदेश की अंतिम वैधानिक समीक्षा का अधिकार राज्य सूचना आयोग के पास होगा।

आदेश में अस्पष्ट निर्देश, ‘मार्गदर्शिका के भाग-4 पैरा-17’ का हवाला, लेकिन उसका विवरण गायब

प्रथम अपीलीय अधिकारी ने अपने आदेश में जनसूचना अधिकारी को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत जारी “मार्गदर्शिका के भाग-4 के पैरा-17” का पालन करने का निर्देश तो दिया है, लेकिन आदेश में यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया कि उस पैरा-17 में आखिर लिखा क्या है।

आदेश की प्रति में न तो उक्त पैरा का उल्लेख किया गया है और न ही उसकी प्रति संलग्न की गई है। ऐसे में अपीलकर्ता यह समझने में असमर्थ है कि जनसूचना अधिकारी को वास्तव में किस प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश दिया गया है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी आदेश में यदि किसी नियम, मार्गदर्शिका या पैरा का हवाला दिया जाता है, तो उसका सार या संबंधित प्रावधान स्पष्ट रूप से उल्लेखित होना चाहिए, ताकि अपीलकर्ता और संबंधित अधिकारी दोनों यह समझ सकें कि आदेश का वास्तविक आशय क्या है। केवल “भाग-4 के पैरा-17 का पालन करें” लिख देना, बिना उसका विवरण दिए, आदेश को अस्पष्ट बनाता है।

इससे यह भी प्रश्न उठता है कि यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी का उद्देश्य RTI अधिनियम की धारा 11 (तृतीय पक्ष) की प्रक्रिया अपनाने का था, तो उन्होंने यह स्पष्ट आदेश क्यों नहीं दिया कि किस तीसरे पक्ष को नोटिस जारी किया जाए, कितने दिनों में आपत्ति ली जाए और उसके बाद सूचना उपलब्ध कराई जाए या अस्वीकार की जाए। इसके बजाय केवल मार्गदर्शिका का हवाला देकर प्रकरण समाप्त कर दिया गया।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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