नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ 13 लोगों द्वारा दायर याचिका पर सोमवार को सुनवाई से इनकार कर दिया. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान 23 अप्रैल को होगा. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका को ‘‘समय पूर्व'' करार देते हुए पीड़ित पक्षों को स्थापित अपीलीय न्यायाधिकरणों से संपर्क करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को अंतरिम वोटिंग अधिकार देने से मना कर दिया है, जिनके नाम वोटर लिस्ट की सफाई प्रक्रिया (SIR) के दौरान हटा दिए गए थे और जिनकी अपीलें अभी भी अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने लंबित हैं।
सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी ने पीठ को बताया कि कम से कम 16 लाख अपीलें दायर की गई हैं। उन्होंने आग्रह किया कि इन लोगों को आगामी दो चरणों के विधानसभा चुनाव में वोट डालने की अनुमति दी जाए। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह बिल्कुल असंभव है। अगर हम ऐसा करते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के मतदान अधिकार निलंबित करने पड़ेंगे। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कुल 34 लाख अपीलें लंबित हैं।
यह आदेश 13 लोगों के एक समूह द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ हस्तक्षेप की मांग की गई थी। पीठ ने याचिका को 'समय से पहले' बताते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं को अपीलीय न्यायाधिकरणों में ही राहत मांगने की सलाह दी। पीठ ने अपने आदेश में कहा चूंकि याचिकाकर्ता (कुरैशा यास्मीन और अन्य) पहले ही अपीलीय न्यायाधिकरणों से संपर्क कर चुके हैं, इसलिए याचिका में व्यक्त आशंकाएं समय से पहले हैं। अगर याचिका स्वीकार कर ली जाती है, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हालांकि, अदालत ने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी।
न्यायमूर्ति बागची ने चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर जोर देते हुए कहा कि जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां वोट देने का अधिकार न केवल संवैधानिक है, बल्कि भावनात्मक भी है। यह लोकतंत्र का हिस्सा होने और सरकार चुनने से जुड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि पूर्व न्यायाधीशों द्वारा गठित न्यायाधिकरणों पर निर्णय की समयसीमा का बोझ नहीं डाला जा सकता। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए गलत तरीके अपनाने की बात नहीं है। साधन ही लक्ष्य को सही ठहराते हैं। हमें उचित प्रक्रिया के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। मतदाता को दो संवैधानिक प्राधिकरणों के बीच नहीं फंसाया जाना चाहिए।
कल्याण बनर्जी ने कहा कि बंगाल के लोग न्याय के लिए इस अदालत की ओर देख रहे हैं. लोग अपने वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं. 34 लाख लोग असली वोटर हैं, इसीलिए वे न्याय के लिए आपकी ओर देख रहे हैं।
टीएमसी ने तर्क दिया कि उन सभी व्यक्तियों को मतदान करने की अनुमति दी जानी चाहिए जिनके नाम 22 अप्रैल तक अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।
इस केस की सुनवाई करते हुए सीजेआई ने कहा कि हमें कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से पत्र मिला है. उन्होंने अपडेट किया है कि 60 लाख से 6 हजार 675 आपत्तियां और दावे निपटाए गए. उनके पास लगभग 1823 आपत्तियों पर निर्णय लिया जाना बाकी है, उनमें तकनीकी कारण हैं. कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपडेट किया है कि उन्होंने न्यायाधिकरणों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तैयार करने के लिए उच्च न्यायालय के तीन सेवानिवृत्त जजों की एक समिति बनाई है।
अधिकारियों को मिलती रहेगी सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम भारत सरकार और निर्वाचन आयोग के साथ-साथ राज्य सरकार को भी यह सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा किसी भी सूरत में वापस नहीं ली जाए।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमाने ढंग से नाम हटा रहा है और अपीलों की सुनवाई समय पर नहीं हो रही है। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डीएस नायडू ने बताया कि लगभग 30 से 34 लाख अपीलें अभी लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि अगर बहस करने की अनुमति ही नहीं दी जाती तो अपीलों का क्या फायदा? क्या इनका फैसला तय समयसीमा में होगा या इन्हें लगातार टाला जाएगा?
गौरतलब है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने पहले ही पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया है। अदालत के कोई विशेष निर्देश न होने तक कोई नया नाम शामिल नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों में हटाए गए लगभग 27 लाख मामलों का फैसला करने के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए हैं।






















