नई दिल्ली
भारत के विविध रूपों को अपने कैमरे में कैद करने वाले देश के प्रख्यात छायाकारों (फोटोग्राफर) में से एक रघु राय का रविवार तड़के यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वह 83 वर्ष के थे. रघु राय के बेटे एवं छायाकार नितिन राय ने बताया ‘‘पिताजी को दो साल पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ था, लेकिन बाद में उन्हें राहत मिलने लगी थी. फिर कैंसर पेट तक फैल गया, जो ठीक हो गया. हाल में यह मस्तिष्क तक पहुंच गया था और उन्हें उम्र संबंधी अन्य तकलीफें भी थीं.''
रघु राय के परिवार में उनकी पत्नी गुरमीत, बेटे नितिन और तीन बेटियां- लगन, अवनि और पूर्वाई हैं. उनका अंतिम संस्कार रविवार शाम चार बजे लोधी श्मशान में किया जाएगा. रघु राय का जन्म 18 दिसंबर 1942 को पंजाब के झंग (पाकिस्तान वाले हिस्से) में हुआ था.
उन्होंने फोटोग्राफी पर कई किताबें भी लिखी थीं.
रघु राय का भारतीय फोटोग्राफी और फोटो पत्रकारिता (Photo Journalist) में करियर 5 दशक से भी ज्यादा रहा है. उन्होंने आपातकाल से लेकर भोपाल गैस त्रासदी को अपने कैमरे में कैद किया था. इसके अलावा उन्होंने देश और दुनिया की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को भी अपने कैमरे में उतारा था. उनकी ली हुई आज भी कई ऐतिहासिक तस्वीरें ऐसे ही हैं, जो महज फोटो नहीं बल्कि एक जीवंत दस्तावेज मानी जाती हैं.
भोपाल त्रासदी की यह तस्वीर नहीं भूल सकता कोई
उनकी भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) की वह तस्वीर तो कई भी नहीं भूल सकता जो उन्होंने 4 दिसंबर 1984 को ली थी. यह उस समय की ब्लैक एंड व्हाइट फोटो थी. जब यह फोटो सामने आई तो पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था. अगर भी कोई तस्वीर देखता है तो वह उस वक्त के हादसे के दर्द को बयान करती है. रघु द्वारा ली गई भोपाल त्रासदी की इस तस्वीर को बाद में स्वतंत्र फोटो जर्नलिस्ट पाब्लो बार्थोलमियो कलर इमेज के साथ नया रूप दे दिया था.
42 साल भी ताजा लगते हैं गैस त्रासदी के जख्म
भोपाल में यूनियन कार्बाइड लिमिटेड (Union Carbide Limited Fctory) नाम की एक फैक्ट्री थी, जहां कीटनाशक दवाओं का निर्माण किया जाता था. फैक्ट्री स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया हुआ करती थी. दो दिसंबर 1984 को कर्मचारी अपनी रात की ड्यूटी पर थे. इसी बीच संयंत्र से खतरनाक गैस (मिथाइल आइसोसाइनेट) का रिसाव शुरू हो गया. टैंक नंबर 610, जहां सबसे पहले गैस रिसाव हुआ. बताया जाता है कि इसी टैंक से निकली गैस पानी से मिल जाने की वजह से बहुत जल्द भोपाल के एक हिस्से को अपने आगोश में लपेट लिया. 3 दिसंबर की सुबह, पूरी दुनिया को इस प्रलय के बारे में पता चला और उन्हें यकीन नहीं हुआ. इस हादसे में तुरंत लगभग 3000 लोगों की जान चली गई और हजारों लोग हमेशा के लिए शारीरिक रूप से कमजोर हो गए.






















