September 2, 2026 12:24 am

बड़वानी में शिक्षा की दुर्दशा:गाय-बकरियों के तबेले में ठूंसे गए 40 आदिवासी बच्चे!

बड़वानी
नरेश रायक सरकार करोड़ों रुपये शिक्षा पर खर्च करने के दावे करती है, मगर हकीकत यह है कि जिले में 40 आदिवासी बच्चों का भविष्य पशुबाड़े में दम तोड़ रहा है। जिस जगह गाय-बकरियां बांधी जाती हैं, वहीं बच्चों की कक्षाएं लग रही हैं। गोबर की बदबू, गंदगी से भरी जमीन और संक्रमण का खतरा—यही है इस ‘तबेला स्कूल’ की असली तस्वीर।

क्या यही है “शिक्षा का अधिकार”?

बच्चे जमीन पर ठूंसे हुए बैठते हैं। बरसात में कीचड़, गर्मी में असहनीय दुर्गंध। सवाल सीधा है—
 क्या आदिवासी बच्चों की शिक्षा की कीमत इतनी सस्ती है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी अपने बच्चों को ऐसे माहौल में पढ़ने भेजेंगे?

जिम्मेदार कौन?
जर्जर/अपर्याप्त भवन की आड़ में पशुबाड़े में स्कूल चलाना किसकी अनुमति से?
शिक्षा विभाग और प्रशासन की निगरानी कहां है?
क्या स्वास्थ्य विभाग ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज की?
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद सिर्फ “अस्थायी व्यवस्था” का बहाना दिया गया। मगर यह अस्थायी इंतजाम कब तक चलेगा? महीनों से बच्चे तबेले में बैठकर पढ़ रहे हैं।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह भविष्य के साथ खिलवाड़ है
बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिले में यदि बच्चों को सम्मानजनक कक्षा कक्ष भी नसीब न हो, तो विकास के दावे खोखले साबित होते हैं।
अब देखना है—
 क्या प्रशासन तुरंत वैकल्पिक भवन की व्यवस्था करेगा? या फिर ‘तबेला स्कूल’ ही जिले की शिक्षा व्यवस्था का स्थायी प्रतीक बन जाएगा?
बच्चों की पढ़ाई पशुबाड़े में और भाषण स्मार्ट क्लास के—यह दोहरी तस्वीर आखिर कब बदलेगी?

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Author: Editor

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