July 18, 2026 3:56 pm

जौहर यूनिवर्सिटी: सपनों की तालीमगाह से बुलडोज़र के निशाने तक, क्या यह सिर्फ कानून की कार्रवाई है या राजनीतिक टकराव की नई कहानी?

अब्दुल सलाम कादरी

रामपुर। कभी उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षा का सबसे बड़ा सपना कही जाने वाली मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी आज अपने सबसे बड़े अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। जिस विश्वविद्यालय को समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान ने शिक्षा का केंद्र बनाने का सपना देखा था, आज उसी विश्वविद्यालय की 40 में से 38 इमारतों पर बुलडोज़र चलाने का आदेश जारी हो चुका है। प्रशासन का कहना है कि भवन बिना स्वीकृत नक्शे के बने हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है।

एक सपने की शुरुआत

साल 2006 में आज़म खान ने मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के माध्यम से जौहर यूनिवर्सिटी की नींव रखी। उद्देश्य था कि रामपुर और आसपास के गरीब एवं पिछड़े तबकों को आधुनिक शिक्षा मिले। बाद में विश्वविद्यालय को निजी विश्वविद्यालय का दर्जा मिला और यहां मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ, कृषि, मानविकी समेत कई संकाय शुरू हुए। हजारों छात्र यहां पढ़ाई करने लगे।

ग्राम पंचायत से RDA तक

विश्वविद्यालय प्रबंधन का सबसे बड़ा तर्क यही है कि जब अधिकांश भवन बनाए गए, तब सिंगनखेड़ा गांव ग्राम पंचायत क्षेत्र में था। उनका कहना है कि यह इलाका 27 सितंबर 2024 तक रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। इसलिए RDA से नक्शा पास कराने का प्रश्न ही नहीं उठता था। बाद में क्षेत्र RDA में शामिल हुआ।

प्रशासन का दावा

रामपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि चाहे क्षेत्र बाद में उसके अधीन आया हो, निर्माण के समय भी सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक था। जांच में पाया गया कि केवल मेडिकल कॉलेज और एक अकादमिक ब्लॉक के लिए ही वैध अनुमति थी, जबकि बाकी 38 भवनों के लिए नहीं। इसी आधार पर ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया।

कानूनी घेराबंदी

जौहर यूनिवर्सिटी पिछले कई वर्षों से कानूनी विवादों में घिरी रही है। भूमि लीज़ रद्द होने से लेकर अन्य मामलों तक कई मुकदमे चले। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई को बरकरार रखा और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

राजनीतिक विवाद

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस कार्रवाई को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताया है। कांग्रेस ने भी इसी तरह के आरोप लगाए हैं। वहीं सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि अंतिम न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ध्वस्तीकरण की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत होगी।

सबसे बड़ा सवाल

यहीं से बहस शुरू होती है। यदि कार्रवाई केवल कानून के पालन के लिए है, तो क्या प्रदेश के हर अवैध निर्माण पर इसी तरह की कार्रवाई होगी? यदि कानून सबके लिए समान है, तो उसका अनुपालन भी समान रूप से दिखाई देना चाहिए। दूसरी ओर, यदि निर्माण वास्तव में बिना आवश्यक अनुमति के हुए हैं, तो प्रशासन का यह भी दायित्व है कि कानून का पालन सुनिश्चित करे।

जौहर यूनिवर्सिटी अब सिर्फ एक शैक्षणिक संस्थान का मामला नहीं रह गई है। यह उत्तर प्रदेश में कानून, प्रशासन और राजनीति—तीनों के टकराव का प्रतीक बन चुकी है। अंतिम फैसला अदालतों और कानूनी प्रक्रिया से ही निकलेगा, लेकिन तब तक यह मामला राजनीतिक बहस के केंद्र में बना रहेगा।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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