अब्दुल सलाम क़ादरी-एडिटर इन चीफ
बेलगहना रेंज में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठे गंभीर सवाल, द्वितीय अपील दायर करने की तैयारी; आयोग के निर्णय के बाद जनसूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट का रुख करने की बात
बेलगहना/बिलासपुर। सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर बेलगहना वन परिक्षेत्र एक बार फिर विवादों में आ गया है। प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश के बावजूद जनसूचना अधिकारी द्वारा जानकारी उपलब्ध कराने से इनकार किए जाने का मामला सामने आया है। अब यह मामला राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के लिए प्रस्तुत किया गया है। वहीं, आयोग के निर्णय के बाद मामले को जनसूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट में भी प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है।

मामला बेलगहना वन परिक्षेत्र से जुड़ा है। ‘खबर 30 दिन’ के प्रधान संपादक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट श्री अब्दुल सलाम कादरी द्वारा वन परिक्षेत्र के वित्तीय वर्ष 01 जनवरी 2025 से मई 2026 तक कैंपा मद के देयक भुगतान के वाउचर एवं उससे संबंधित कैशबुक की सत्यापित प्रति मांगी गई थी।
इस संबंध में बेलगहना स्थित कार्यालय जनसूचना अधिकारी एवं वन परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा दिनांक 17/08/2026 को जारी पत्र में सूचना देने से इनकार किया गया है। पत्र में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 11 के तहत तृतीय पक्ष की जानकारी तथा निजी बैंक खातों से संबंधित जानकारी होने का हवाला दिया गया है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि कैंपा मद योजनांतर्गत कराए गए कार्यों में संलग्न श्रमिकों द्वारा अपने बैंक खातों के संबंध में व्यक्तिगत जानकारी प्रदान करने हेतु असहमति जाहिर की गई है।
बताया गया है कि यह मामला अपील प्रकरण क्रमांक 67/2026 से संबंधित है तथा जनसूचना अधिकारी द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जारी मार्गदर्शिका के भाग-4 के पैरा 17 का पालन करते हुए आवेदक को अवगत कराया गया है।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा जानकारी उपलब्ध कराने के संबंध में आदेश दिया गया था, तो उसके बावजूद जनसूचना अधिकारी द्वारा जानकारी देने से इनकार क्यों किया गया? क्या मांगी गई जानकारी वास्तव में ऐसी है, जिसे सार्वजनिक किए जाने से किसी व्यक्ति की निजता प्रभावित होगी, या फिर इसके पीछे किसी अन्य कारण से जानकारी को रोकने का प्रयास किया जा रहा है?
मांगी गई जानकारी के मामले में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है, जिसको छुपाने के लिए जनसूचना अधिकारी ने जानकारी देने से इनकार किया है, ऐसा आरोप लगाया जा रहा है। यदि ये अधिकारी ईमानदार होते तो किसी भी प्रकार से जानकारी देने से इनकार नहीं करते—यह सवाल भी अब चर्चा में है।
सूत्रों ने बताया कि लाखों ही नहीं, बल्कि विगत कुछ सालों में इस रेंज में करोड़ों का वारा-न्यारा हो चुका है। आरोप है कि अधिकारी और कर्मचारियों ने मिलकर फर्जी मजदूरों के नाम पर अपने जान-पहचान और रिश्तेदारों के अकाउंट में राशि ट्रांसफर करवाया गया है। साथ ही अघोषित ठेकेदारों के मार्फत भी बहुत बड़ी-बड़ी रकम का आदान-प्रदान हुआ है।
इन गंभीर आरोपों की वास्तविकता क्या है, यह तो संबंधित दस्तावेजों, भुगतान अभिलेखों, वाउचर, कैशबुक और बैंक खातों की निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन आरटीआई के माध्यम से इन्हीं दस्तावेजों की जानकारी मांगे जाने और उसके बाद सूचना उपलब्ध नहीं कराए जाने से मामले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गौरतलब है कि बेलगहना रेंज शुरू से ही विवादों में रहा है। ऐसे में कैंपा मद से संबंधित भुगतान और उससे जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक होने से यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता हुई है तो दस्तावेजों के माध्यम से उसकी भी वास्तविकता सामने आ सकती है।
अब मामला राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। आयोग के निर्णय के बाद, यदि आवश्यक हुआ, तो जनसूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए मामले को हाईकोर्ट में भी प्रस्तुत किया जाएगा।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि बेलगहना वन परिक्षेत्र में पूरी पारदर्शिता क्यों नहीं होती? यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमानुसार है तो मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने में आखिर आपत्ति क्यों है? इस पूरे मामले में अब वन मंत्री और मुख्यमंत्री ही बता पाएंगे कि इस रेंज में पूरी पारदर्शिता क्यों नहीं होती है।






















