March 14, 2026 5:47 pm

“जंगल सफारी में ‘मंगल’ नहीं, ‘दंगल’! — वन विभाग का नया प्रयोग, जंगल के बीच राजनीति का अखाड़ा?”

रायपुर/छत्तीसगढ़। अब्दुल सलाम क़ादरी।
छत्तीसगढ़ के जंगलों में इन दिनों एक अलग तरह की हलचल चर्चा का विषय बनी हुई है। यह हलचल न तो बाघों की दहाड़ से जुड़ी है और न ही हिरणों की दौड़ से, बल्कि वन विभाग के एक फैसले को लेकर उठ रहे सवालों से है। रायपुर स्थित नंदनवन जंगल सफारी के परिसर में बने एक सरकारी कार्यालय को लेकर कर्मचारियों और विभागीय सूत्रों के बीच चर्चा का माहौल गर्म है।

बताया जा रहा है कि जंगल सफारी परिसर के अंदर वन कर्मचारियों के लिए एक नवीन कर्मचारी भवन का कार्यालय बनाया गया है, जिसे लेकर विभाग के अंदर और बाहर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

सूत्रों के अनुसार यह व्यवस्था श्रीनिवास राव के कार्यकाल में शुरू हुई है। आलोचकों का कहना है कि जंगलों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के लिए बने परिसर में अब कर्मचारियों की बैठकों, चर्चाओं और संगठनात्मक गतिविधियों का नया केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।


जंगल सफारी में ‘राजनीतिक सफारी’?

वन विभाग के रायपुर डिवीजन के इस परिसर में बना कार्यालय अब कथित रूप से कर्मचारियों की बैठकों और संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र बन गया है। विभागीय कर्मचारियों के बीच इस फैसले को लेकर चर्चा का माहौल है।

एक कर्मचारी ने मजाकिया अंदाज में कहा—
“अब जंगल की सुरक्षा फाइलों में होगी और राजनीति जंगल सफारी के कार्यालय में।”

कुछ कर्मचारियों का कहना है कि कार्यालय में बैठने, चर्चा करने और आराम करने जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। इसी वजह से कई लोग इसे व्यंग्य में “वन कर्मचारियों का राजनीतिक विश्राम गृह” तक कह रहे हैं।


“शेर भी हैरान, हिरण भी परेशान!”

जंगल सफारी के माहौल को लेकर कर्मचारियों के बीच हल्की-फुल्की चुटकियां भी ली जा रही हैं।

एक कर्मचारी ने हंसते हुए कहा—
“अगर यही स्थिति रही तो जल्द ही जंगल सफारी का नाम ‘राजनीतिक सफारी पार्क’ रखना पड़ेगा।”

कर्मचारियों का कहना है कि पहले इस परिसर का मुख्य उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता से जुड़ी गतिविधियाँ थीं, लेकिन अब यहां बैठकों और चर्चाओं का नया सिलसिला शुरू होता दिखाई दे रहा है।


“कार्यालय या राजनीतिक कैंप?”

बताया जा रहा है कि परिसर में आने-जाने वाले कर्मचारियों के लिए भोजन और विश्राम जैसी व्यवस्थाएँ भी की गई हैं। इसी वजह से कुछ लोग इसे व्यंग्य में “राजनीतिक कैंप” भी कह रहे हैं।

एक कर्मचारी ने चुटकी लेते हुए कहा—
“अब जंगल सफारी में योगा कैंप नहीं, राजनीतिक कैंप लगेंगे।”

हालांकि विभाग के कुछ लोग इसे कर्मचारियों के लिए बनाई गई सामान्य सुविधा बता रहे हैं।


कार्यशैली पर उठते सवाल

वन विभाग के शीर्ष अधिकारी श्रीनिवास राव की कार्यशैली को लेकर पहले भी कई बार चर्चाएँ होती रही हैं। आलोचकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में लिए गए कुछ फैसलों पर विभाग के भीतर बहस होती रही है।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यदि उनके पूरे कार्यकाल की प्रशासनिक और संपत्ति संबंधी जांच हो तो कई तथ्य सामने आ सकते हैं। हालांकि इन आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।


अगर हर विभाग ने ऐसा किया तो?

इस मामले के बाद कई कर्मचारी यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अगर हर विभाग में इसी तरह की व्यवस्था शुरू हो जाए तो स्थिति क्या होगी।

मजाक में कुछ लोगों ने कहा—

  • शिक्षा विभाग में “राजनीतिक कक्षा”
  • स्वास्थ्य विभाग में “बहस वार्ड”
  • राजस्व विभाग में “रणनीति सम्मेलन”

एक वरिष्ठ कर्मचारी ने टिप्पणी की—
“अगर यही ट्रेंड चल पड़ा तो सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी कम और राजनीतिक रणनीतिकार ज्यादा दिखाई देंगे।”


अब मंत्री के संज्ञान का इंतजार

अब सभी की नजरें छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप पर टिकी हुई हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या मंत्री इस मामले का संज्ञान लेंगे या यह व्यवस्था ऐसे ही जारी रहेगी।

कुछ प्रमुख सवाल उठ रहे हैं—

  • क्या इस नए कार्यालय की स्वीकृति नियमों के तहत दी गई है?
  • क्या इसकी अनुमति विभागीय प्रक्रिया के अनुसार हुई है?
  • क्या इस मामले की विभागीय जांच होगी?

जंगल की नई कहानी

जंगलों की दुनिया हमेशा रहस्यमयी रही है, लेकिन रायपुर के जंगल सफारी में इन दिनों एक नई कहानी चर्चा में है। यहां पेड़ों की छांव में अब सिर्फ पक्षियों की चहचहाहट ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक फैसलों पर उठती चर्चाओं की गूंज भी सुनाई दे रही है।

एक कर्मचारी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“जंगल में पहले शेर राजा होता था, अब लगता है नेता राजा बनने की तैयारी कर रहे हैं।”

फिलहाल यह मामला लोगों के बीच चर्चा और व्यंग्य दोनों का विषय बना हुआ है। कोई इसे प्रशासनिक सुविधा बता रहा है तो कोई इसे “राजनीति का जंगल संस्करण” कह रहा है।

BBC LIVE
Author: BBC LIVE

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